संगरूर जिले की दिड़बा सुरक्षित सीट से विधायक हरपाल चीमा को नेता प्रतिपक्ष बनाने का फैसला आम आदमी पार्टी ही नहीं, सभी के लिए चौंकाने वाला रहा। किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। सुखपाल खैरा का जाना तय था। उसके बाद तीन प्रमुख दावेदार कंवर संधू, अमन अरोड़ा और प्रो. बलजिंदर कौर थे। तीनों ही सदन में मुखर रहे हैं और अच्छे वक्ता माने जाते हैं। संधू नहीं बनेंगे, यह तय था, क्योंकि उन्हें खैरा का करीबी माना जाता है। बाकी दोनों में अमन की दावेदारी ज्यादा मजबूत थी। उन्हें हाईकमान का करीबी माना जाता है। लेकिन इन सबको दरकिनार कर पार्टी ने हरपाल चीमा को बना दिया।
चीमा सदन में बहुत ज्यादा एक्टिव नहीं हैं, न ही बहुत अच्छे वक्ता हैं। दिल्ली दरबार में भी उन्हें किसी का करीबी नहीं माना जाता है। पंजाब में भी वह किसी गुटबाजी में नहीं थे। फिर चीमा को क्यों बनाया गया, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व में गुटबाजी इसकी वजह हो सकती है। अमन और बलजिंदर को संजय सिंह का करीबी माना जाता है। जबकि, अंदरखाते पंजाब के फैसले इस समय दुर्गेश पाठक ले रहे हैं।
इसलिए दोनों को दरकिनार कर दिया गया। कुछ लोगों का मानना है कि पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वही सुप्रीम है। वह किसी को भी विधायक बना सकती है और नेता प्रतिपक्ष भी बना सकती है। पार्टी से ऊपर कोई नहीं है, चाहे उसका कद सुखपाल खैरा जितना बड़ा क्यों न हो। इसलिए कोई भी हाईकमान को आंखें न दिखाए।
बस से पहुंचे से सत्र में हिस्सा लेने
हरपाल चीमा (43) पिछले साल मार्च में हुए विधानसभा के पहले सत्र में पीआरटीसी की बस में बैठ कर हिस्सा लेने पहुंचे थे। उन्होंने साथ बैठे लोगों को भनक भी लगने नहीं दी कि वह विधायक हैं। एक व्यक्ति द्वारा पहचानने के बाद लोगों को पता चला तो उन्होंने सेल्फी ली।
तब मीडिया को पता चला। पेशे से वकील चीमा को हाल ही में प्रदेश लीगल सेल का प्रमुख बनाया गया था। वह गरीब परिवार से हैं, उनके पिता फौज में थे। विधानसभा चुनाव 2017 में चीमा द्वारा दिए एफिडेविट के मुताबिक उनके पास कोई कार नहीं, सिर्फ एक स्कूटर था।