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मां की तलाश में है हिंदू पिता का मुस्लिम बेटा

Fri, 06 Jun 2014 04:57 PM IST
सतिन्द्र बैंस/अमर उजाला, चंडीगढ़
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मोहम्मद हुसैन पुत्र राज कुमार जोशी, बस अब यही पहचान है हिंदू मां-बाप के घर जन्मे चंडीगढ़ के पुनीत प्रताप जोशी की। यह कोई रहस्यमयी उपन्यास नहीं बल्कि अपनी मां की तलाश में भटक रहे 19 साल के लड़के की कहानी है, जिसकी पहचान धर्म से नहीं सिर्फ नाम से है।
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मोहम्मद हुसैन बन चुके पुनीत जोशी के साथ वक्त ने ऐसा मजाक किया है कि उसके पैन नंबर पर लिखे पिता के नाम (मोहम्मद हुसैन पुत्र राज कुमार) के अलावा अब उसके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं जो उसके हिंदू होने की पुष्टि करता हो। मदरसे में पढ़े पुनीत को मुस्लिम धर्म में अब एक सम्मानित मुकाम हासिल हो चुका है।

बचपन में जहां वह बड़ा होकर डॉक्टर या इंजीनियर बनने के सपने देखा करता था लेकिन अब वह मौलवी बनने की चाह रखता है। इसके लिए वह सोनीपत के एक मदरसे से मौलवियत का कोर्स कर रहा है।
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मां के साथ गुम हो गई पहचान

कुरान-ए-करीम उसे जुबानी याद है जिसके लिए हाफिजा-ए-कुरान के खिताब से नवाजा गया है। बिना रुके कुरान पढ़कर पुनीत अपनी दिमागी शक्ति का लोहा मनवा चुका है। बेसहारा और लाचार पुनीत प्रताप जोशी मोहम्मद हुसैन कैसे बन गया।

इस नई पहचान के पीछे एक लंबी और दिल दहला देने वाली दास्तान है जो किसी थ्रिलर सीरियल की तरह परत दर परत खुलती है। उसकी यह दास्तान धर्म की राजनीति करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है।

पुनीत की जिंदगी का ताना-बाना उसकी सुनीता गंदोतरा की तलाश के इर्द-गिर्द घूमता है जो उसे बचपन में छोड़ कर कहीं चली गई और आज तक उसका कोई सुराग नहीं मिल सका। मां के साथ ही पुनीत की पहचान भी गुम हो गई। बेघर हुए पुनीत ने न जाने कितनी रातें खुले आसमां के नीचे गुजारीं।

चंडीगढ़ में रहने वाली उसकी मां की एक सहेली, जिसे वह मौसी बुलाता है, ने बुरे वक्त में पुनीत को सहारा दिया। मेरी मुलाकात पुनीत से इसी सिलसिले में हुई, जब अमर उजाला का संपादक पद संभालने के बाद वह मुझसे मिलने पहुंचा। वह इसी उम्मीद से आया कि शायद मैं उसकी मां को ढूंढने में उसकी कोई मदद कर सकूं।

पिता के मौत के बाद मां रहती थी परेशान

पुनीत ने बताया कि 1998 में उसके पिता राज कुमार जोशी का देहांत हो गया। मां सेक्टर-17 चंडीगढ़, पंजाब एजुकेशन डिपार्टमेंट में क्लर्क थी। पति की मौत के बाद वह मानसिक तौर पर परेशान रहने लगी। काम ठीक से नहीं कर पाने के कारण सुनीता को समय से पहले रिटायर कर दिया गया।

सुनीता उस समय चंडीगढ़ के सेक्टर-22 के सरकारी मकान नंबर 3602 में अपने बेटे पुनीत केसाथ रह रही थी। नौकरी छूट जाने के बाद उसने सेक्टर-25 में मकान नंबर 713 खरीद लिया और वहीं रहने लगी। सुनीता के सहयोगी कर्मचारियों ने बताया कि वह अपने बेटे से बहुत प्यार करती थी लेकिन मानसिक रोग के कारण उसके पालन-पोषण में वह कठिनाई महसूस करने लगी थी।

इस पर उसने शहर की कुछ धार्मिक और स्वयंसेवी संस्थाओं को बेटे की जिम्मेदारी लेने की गुहार लगाई लेकिन कोई आगे नहीं आया। पुनीत उस समय आठ साल का था जब 2003 में सुनीता उसे मनीमाजरा के एक मदरसे में छोड़ आई। मौलवी हाफिज मेहरबान ने उसकी जिम्मेदारी ली और उसे छत के साथ-साथ शिक्षा भी दी।

साढ़े पांच साल से मां का सुराग नहीं

पुनीत बताता है कि मां उसे मिलने के लिए मदरसे में आती रहती थी और कभी-कभी वह उससे मिलने घर चला जाता। लेकिन नवंबर 2009 में जब मां उसे मिलने नहीं आई तो वह मौलवी के साथ अपने घर गया। वहां ताला लगा देख उसके होश उड़ गए।

पड़ोसियों से पता चला कि सुनीता 13 नवंबर 2009 को घर बेचकर कहीं और चली गई लेकिन कहां, इसका पता आज तक नहीं चल पाया। सुनीता की गुमशुदगी की रिपोर्ट सेक्टर-24 पुलिस थाने में दर्ज है। पुनीत का कहना है कि पुलिस उसकी मां को ढूंढने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही।

घर किस को बेचा, कितने में बेचा, खुद कहां चली गई, यह ऐसे सवाल हैं जो पुनीत को अक्सर परेशान करते हैं। आखिरकार 2013 में उसने एक वकील मंसूर अली खान की मदद से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में अपनी मां को ढूंढने की याचिका दायर की। इस पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी।

बर्थ सर्टिफिकेट में बदला मां का नाम

पुनीत के बर्थ सर्टिफिकेट में मां का नाम गलत लिख दिया गया। पांच साल तक लड़ाई लड़ने के बाद हाल ही में चंडीगढ़ में तैनात हुए डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद शालीन के आदेश पर नाम सही किया गया है।

यही नहीं, सेक्टर-22 के पंजाब नेशनल बैंक में 2011 तक मां की पेंशन भी आती रही है जो बैंक वाले उसे नहीं दे रहे। पुनीत ने इसके लिए भी हाईकोर्ट में गुहार लगाई है।
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प्रदर्शनी देखी तो ‘महक’ उठा पुनीत

पुनीत का कहना है कि वह पूरी तरह से टूट चुका था। इसी दौरान वह हिमाचल भवन में एक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी देखने गया तो उसकी मुलाकात पाकिस्तान से आए बिजनेसमैन स्तर टैक्सटाइल कराची के मलिक जुनीद से हुई।

उन्होंने पुनीत की कहानी सुनी और उसे एक नया रास्ता दिखा दिया। उसे इत्र का व्यापार करने की सलाह दी। बस फिर क्या, पुनीत ने अपने लिए नई जिंदगी तलाश ली।

अब वह इत्र बेचता है और भारत के सभी बड़े ट्रेड फेयर्स में उसका स्टॉल आकर्षण का केंद्र बनता है। इत्र की खुशबू से लिबरेज पुनीत आज भी अपनी मां को हर तरफ ढूंढता है। क्या चंडीगढ़ पुलिस इस चुनौती को स्वीकार करेगी?
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