परिजनों ने राशन कार्ड में उसका नाम दर्ज करा रखा था। अमर सिंह की शादी 1982 में शीला कौर पुत्री घनश्याम सिंह के साथ हुई। 1984 के दंगे के दौरान अमर सिंह पत्नी के साथ बहन कांता की डिलीवरी कराने जोधपुर चला गया। उस दौरान वहां उन्हें करीब डेढ़ माह तक रहना पड़ा। वह दंगे के कारण केश कटवाकर और पत्नी को साड़ी पहनाकर ट्रेन से रेवाड़ी पहुंचे। यहां अमर सिंह के माता-पिता रहते थे।
दंगा शांत होने के बाद जब दिल्ली सुल्तानपुरी गए तो आस पड़ोस के लोग उन्हें जिंदा देखकर हैरत में पड़ गए। वहां लोगों से पता चला कि परिजनों ने अमर सिंह, उसकी पत्नी और छोटी बहन बलजीत कौर (जयपुर) को मृतक घोषित करा दिया था। परिजनों ने उस समय दंपति को वहां से डराकर वापस भेज दिया। खतरे को भांपते हुए अमर सिंह वापस रेवाड़ी माता-पिता के पास आ गया।
उसका आरोप है कि मुआवजा पाने के लिए परिजनों ने यह साजिश रची। उसने सरकार से मांग की है कि उनके साथ न्याय किया जाए तथा 1984 दंगा पीड़ितों की सूची में उन्हें भी शामिल किया जाए। उन्होंने बताया कि वह अपने परिवार के साथ आज भी रेवाड़ी में किराये के मकान में रहते हैं और मजदूरी कर परिवार का गुजारा चला रहे हैं।
अमर सिंह ने बताया कि 1984 के सिख दंगों में मृत दिखाकर परिजनों ने ही उन्हें चोट पहुंचाई है। आज वह सरकार की ओर से दिए गए फ्लैटों में रह रहे हैं और उन्हें मरा हुआ दिखाकर लाखों रुपये का मुआवजा डकार गए। उसका कहना है कि उसके परिवार को जान का खतरा है कि क्योंकि इस झूठ का राज खुलने से वह लोग उनकी जान के दुश्मन बन गए हैं।
जमीन पर भी किया कब्जा
अमर सिंह ने बताया कि भारत-पाक बंटवारे के समय उन्हें राजस्थान की तहसील किशनगढ़ के गांव पालपुर में सरकार ने जमीन दी थी। यहां उनकी जमीन है, लेकिन इस जमीन पर कुछ लोगों ने कब्ज कर लिया है।
कई साल पहले की थी शिकायत
अमर सिंह के मुताबिक, यहां कई वर्ष पहले जिला प्रशासन और गोकलगेट चौकी में शिकायत दी, लेकिन उस समय कार्रवाई से यह कह कर इन्कार कर दिया कि मामला दिल्ली का है और दिल्ली में ही शिकायत करो। उसके बाद दिल्ली में सीबीआई के एक अधिकारी को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।