सभी स्कूलों पर रिजल्ट बेहतर करने का प्रेशर रहता है। इससे स्कूल की रैंकिंग बनती है। कोई बच्चा स्कूल का रिजल्ट खराब न कर दे, इस चक्कर में स्कूल प्रबंधक बच्चे का आईक्यू टेस्ट कराने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। टीचर्स अभिभावकों को आईक्यू टेस्ट कराने की सलाह दे रहे हैं। यहीं नहीं अभिभावक भी खुद बच्चे का आईक्यू टेस्ट करा रहे हैं, ताकि उससे अनुसार बच्चे की आगे की पढ़ाई करवाएं।
मनोचिकित्सक डॉ. आर के बंसल ने बताया कि हाल ही में रिजल्ट आया है। इस दौरान अगर किसी बच्चे के कम नंबर आए हैं, तो कई अभिभावक उनका आईक्यू टेस्ट कराने के लिए आ रहे हैं। ताकि उन्हें पता चल सके कि वो पढ़ाई में कैसा है।
इस दौरान एक महीने में 15 से ज्यादा अभिभावक अपने बच्चे का आईक्यू टेस्ट कराने के लिए आए हैं। सामान्य तौर पर 90 से 110 के बीच में आईक्यू लेवल होता है। 125 से 130 आईक्यू लेवल होने पर बच्चे को होशियार माना जाता है। वैसे 150 तक आईक्यू हो सकता है। अगर किसी का आईक्यू लेवल 70 से कम है तो उसको मेंडल रिटारटेशन (मानसिक मंदता) के वर्ग में रखते हैं।
मनोविज्ञानिक डॉ. रश्मि ने बताया कि अभिभावक बच्चे का मेमोरी टेस्ट, इंटेलिजेंसी टेस्ट के साथ - साथ 12 वीं के बच्चों का इंट्रस्ट टेस्ट भी करा रहे हैं। कई केस ऐसे आएं हैं, जिसमें स्कूल की तरफ से अभिभावक को बच्चे का आईक्यू टेस्ट कराने के लिए कहा गया है। रिजल्ट के दौरान आईक्यू टेस्ट कराने वालों का आंकड़ा बढ़ गया है।
सीबीएसई कॉर्डिनेटर नोएडा और एमिटी स्कूल की प्रिंसिपल रेनू सिंह ने बताया कि कई बार कोई बच्चा बार - बार एक ही शब्द लिखता है तो उसका लर्निंग डिस्ऐबिलिटी टेस्ट करा लेते हैं। ताकि बचपन में ही उसकी दिक्कत को दूर किया जा सके।
लेकिन आईक्यू टेस्ट कराना बिल्कुल सही नहीं है। अगर कोई स्कूल ऐसा करा रहा है तो वो बिल्कुल गलत है। यहां तक कि अभिभावकों को भी ऐसा नहीं करना चाहिए। सभी बच्चे पढ़ने में एक जैसे नहीं हो सकते हैं।
क्या होता है आईक्यू टेस्ट
कई बार जब बच्चे के अच्छे नंबर नहीं आते तो अभिभावक उसका आईक्यू कराते हैं। इसमें डॉक्टर अपनी समझ के अनुसार बच्चे का मेमोरी, इंटेलिजेंसी जैसे आदि टेस्ट करता है। इससे पता चलता है कि बच्चा कितनी जल्दी बातों को समझ सकता है। उनके अनुसार डॉक्टर बच्चे का आईक्यू लेवल बताता है।