नेशनल एयरलाइंस कैरियर के नाम से मशहूर एयर इंडिया अब सरकार के लिए डूबता जहाज बन गया है। एक जमाने में महाराजा की तूती पूरी दुनिया में बोलती थी। लेकिन तत्कालीन यूपीए सरकार के कुछ फैसलों से इस पर 52 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ गया, जिससे अब निजात पाने के लिए सरकार ने इसे बेचने का मन बना लिया है।
टाटा ग्रुप द्वारा इसको खरीदने की खबरों के बीच हम आपको बताने जा रहे हैं वो पांच कारण, जिनकी वजह से एयर इंडिया सरकार के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा है।
नेशनल मार्केट में केवल 14 फीसदी शेयर
एयर इंडिया का नेशनल मार्केट में केवल 14 फीसदी शेयर है। नेशनल एविएशन मार्केट में एयर इंडिया के मुकाबले इंडिगो और जेट एयरवेज जैसी प्राइवेट एयरलाइंस का कब्जा है। वहीं इंटरनेशनल मार्केट में भी एयर इंडिया को कई विदेशी एयरलाइंस से कड़ी टक्कर मिल रही है, जिससे लगातार उसका प्रॉफिट गिर रहा है। प्रॉफिट गिरने और नेशनल सेक्टर में लोगों का एयर इंडिया के प्रति झुकाव कम होने से भी मार्केट से लिए गए कर्ज की भरपाई करने में कंपनी और सरकार को दिक्कत आ रही हैं।
2003 में वाजपेयी सरकार ने दिया था प्राइवेट करने का प्रपोजल
एयर इंडिया
2003 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस को प्राइवेट करने के लिए अपनी सहमति दी थी और नरेश चंद्रा कमेटी गठित की थी। कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में सरकार के सुर में सुर मिलाया था। लेकिन सरकार के गिरने के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
इसके बाद यूपीए सरकार में बने नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने एयर इंडिया की फ्लीट को मॉर्डन करने के लिए बोइंग को 111 एयरक्रॉफ्ट बनाने का ऑर्डर दे दिया। सरकार ने इसके लिए 70 हजार करोड़ का भारी भरकम बजट रखा था और 50 विमानों की सप्लाई के लिए 33197 करोड़ रुपये दिए थे।
सरकार को उम्मीद थी कि वो एयर इंडिया के मुनाफे से इसकी भरपाई कर सकेगी। हालांकि सरकार के इस निर्णय की कैग ने अपनी रिपोर्ट में आलोचना की थी और मई 2017 में सीबीआई ने पटेल और अन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई थी।
2007 में एयर इंडिया में किया इंडियन एयरलाइंस का विलय
पटेल के इस फैसले से एयर इंडिया की फ्लीट जैसे ही बढ़ गई वैसे ही सरकार ने 2007 में इंडियन एयरलाइंस का विलय करने का फैसला किया। ऐसा करने से जहां 2002-03 में दोनों कंपनियों को 63 करोड़ का लॉस था वो 2010-11 में 7 हजार करोड़ के पार चला गया।
फिर अगले 5 सालों में यह बढ़कर 20 हजार करोड़ रुपये हो गया। एयर इंडिया के वर्तमान में चेयरमैन अश्विनी लोहानी ने भी विलय को कंपनी के लिए काफी घातक बताया है।
यूपीए 2 में 20 साल के दिया गया 48212 करोड़ रुपये
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- फोटो : air india
2011 में यूपीए 2 सरकार के दौरान फैसला लिया गया कि इक्विटी के जरिए 20 सालों के लिए दिया जाए। इसका मकसद यह था कि एयर इंडिया के कर्ज को और कम किया जाए। लेकिन सरकार का यह फैसला भी उल्टा पड़ गया।
सोचा गया था कि इससे एयर इंडिया अच्छा कमाने लगेगा 2017 के बाद इसके पास अपना पैसा आ जाएगा, लेकिन ब्याज का भुगतान न करने के कारण लॉस बढ़ता गया और यह 52 हजार करोड़ के कर्ज में डूब गया।