इंफ्रस्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएलएंडएफएस) समूह में फर्जीवाड़े की पड़ताल कर रहे सेबी ने पांच क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के खिलाफ अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया है। समूह के नए बोर्ड की ओर से कराए गए फॉरेंसिक ऑडिट में कई गंभीर खामियों का खुलासा हुआ है। इसके बाद सेबी ने अपना शिकंजा और मजबूत कर दिया है।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) को पता चला है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और आईएलएंडएफएस समूह के पूर्व शीर्ष अधिकारियों की मिलीभगत से 90 हजार करोड़ का भारी-भरकम फर्जीवाड़ा हुआ। फॉरेंसिक ऑडिट में निष्कर्ष निकाला गया कि कमजोर वित्तीय स्थिति के बावजूद समूह की कंपनियों को शीर्ष वित्तीय रेटिंग दी गई।
सेबी के दखल के बाद दो रेटिंग एजेंसियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) को जांच पूरी होने तक जबरन अवकाश पर भेज दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि नियामक अब सभी पांचों एजेंसियों में संभावित प्रणालीगत खामियों की जांच कर रहा है। इसके अलावा रेटिंग प्रक्रियाओं में जानबूझकर गड़बड़ी करने वाले कई लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है।
अधिकारियों ने छुपाई जानकारी
ग्रांट थॉर्नटन के विशेष ऑडिट में पता चला है कि समूह के पूर्व उच्च अधिकारियों और रेटिंग एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों के बीच ई-मेल से बातचीत होती थी। रेटिंग एजेंसियों के अधिकारियों को समूह की गंभीर नकदी चिंताओं और उसकी कमजोर होती वित्तीय स्थिति की जानकारी थी। इसे छुपाने के लिए समूह के तत्कालीन महत्वपूर्ण अधिकारियों ने रेटिंग एजेंसियों के अधिकारियों को उपहार व अन्य लाभ दिए और जून, 2012 से जून, 2018 तक लगातार ऊंची रेटिंग हासिल की।