वैश्विक रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अनुमान जताया है कि चालू वित्तवर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था को सबसे खराब मंदी का दौर झेलना पड़ेगा। क्रिसिल ने कहा, आजादी के बाद से भारत में यह चौथी मंदी है और 1990 की उदारीकरण के बाद पहली। लॉकडाउन और कोरोना महामारी के प्रभावों को देखते हुए लग रहा है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था 5 फीसदी तक घट जाएगी।
सबसे ज्यादा असर पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में दिखेगा, जहां जीडीपी 25 फीसदी तक घटने की आशंका है। अर्थव्यवस्था पर नुकसान का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कुल जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर स्थायी नुकसान हो सकता है। ऐसे में विकास दर महामारी के पहले की स्थिति तक पहुंचने में तीन साल लग सकते हैं। इससे पहले भारत में 1958, 1966 और 1980 में मंदी का दौर आया था।
असर... एक नजर में
- 2.5 फीसदी की तेजी रहेगी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में
- 16 फीसदी गिरा है औद्योगिक उत्पादन मार्च में
- 60.3 फीसदी घट गया निर्यात अप्रैल में
- 35 फीसदी गिरावट आई नए दूरसंचार उपभोक्ता में
- 35 फीसदी की कमी आई है रेलवे की माल ढुलाई में
घरेलू रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स ने कहा है कि चालू वित्तवर्ष में राज्यों का राजकोषीय घाटा डेढ़ गुना बढ़कर जीडीपी का 4.5 फीसदी यानी 8.5 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा, जो पहले 3 फीसदी रहने का अनुमान था। इतना ही नहीं राजस्व वसूली और खर्च की खाई भी चौड़ी होकर 2.8 फीसदी पहुंच जाएगी। केंद्र ने राज्यों को बाजार से 5 जीडीपी का फीसदी उधार लेने की छूट दी है, जो उन पर राजकोषीय दबाव और बढ़ाएगा।
निर्माण क्षेत्र पर असर
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कहा है कि राज्यों के राजस्व घाटे में इजाफे की वजह से निर्माण गतिविधियों पर बुरा असर पड़ेगा। कर वसूली में नरमी के कारण अधिकतर राज्य खर्च घटाने की तैयारी में है जिसका सीधा असर निर्माण क्षेत्र पर होगा। 2020-21 में राज्यों ने खर्च के लिए 5.7 लाख करोड़ का बजट रखा है, जिसमें अब बड़ी कटौती का अनुमान है।