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प्रकाशक चाहते हैं कि उन पर लगे जीएसटी, 8 से 10 फीसदी का हो रहा नुकसान

Tue, 26 Jun 2018 09:04 AM IST
शिशिर चौरसिया, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : अमर उजाला
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आमतौर पर कारोबारी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) या वैट से मुक्त रहकर काम करना चाहते हैं, लेकिन इसी देश में कुछ कारोबारी ऐसे हैं, जो चाहते हैं कि उनसे जीएसटी लिया जाए। इसके लिए उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्रालय से गुहार लगाई, लेकिन वहां से सकारात्मक जवाब नहीं मिलने की वजह से अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इनमें मेरठ के किताब प्रकाशक भी शामिल हैं।

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उत्तर भारत में किताब के प्रकाशन का हब माने जाने वाले मेरठ के प्रकाशन कारोबारियों ने पिछले साल जीएसटी लागू होते ही केंद्रीय वित्त मंत्रालय से किताब प्रकाशकों पर भी जीएसटी लगाने की गुहार लगाई थी। लेकिन इनकी मांग अभी तक नहीं मानी गई है। इसके बाद प्रकाशकों ने मेरठ प्रकाशक संघ के बैनर तले दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की है। इसमें न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि उन्हें जीएसटी के दायरे में शामिल करने का निर्देश दिया जाए।

 
 

जीएसटी लगने से होगा फायदा

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मेरठ प्रकाशक संघ की तरफ से रिट याचिका दायर करने वाले लॉ फर्म खेतान एंड कंपनी के साझेदार अभिषेक ए. रस्तोगी ने अमर उजाला को बताया कि प्रकाशन व्यवसाय पर अभी जीएसटी नहीं लग रहा है, इस वजह से उन्हें 8-10 फीसदी का नुकसान हो रहा है। इसलिए वह चाहते हैं कि उन पर जीएसटी लगाया जाए। यदि उनके ऊपर पांच फीसदी का जीएसटी लगता है तो अभी के मुकाबले उन्हें काफी फायदा होगा।
 

 

कई सेवाओं पर देते हैं जीएसटी

स्तोगी का कहना है कि प्रकाशकों से भले ही जीएसटी नहीं लिया जा रहा हो, लेकिन वह जो कागज, ग्लू, धागा, गत्ता या स्याही खरीदते हैं, उनके ऊपर जीएसटी चुकाते हैं। कई प्रकाशकों के पास सब तरह की छपाई के लिए मशीन नहीं है, तो वह दूसरे छापेखाने की भी सेवा लेते हैं, जिस पर जीएसटी लगता है। जो उनके रचनाकार (ऑथर) होते हैं, वह तो जीएसटी नहीं चुकाते, लेकिन उनकी तरफ से प्रकाशक को रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है।

प्रकाशक यदि दफ्तर या छापेखाने के लिए किराये या लीज पर बिल्डिंग लेते हैं, तो उस पर जीएसटी देना होता है। छपी किताबों के भंडारण के लिए यदि गोदाम की सेवा लेते हैं, तो उस पर भी जीएसटी देना होता है। इतना कर चुकाने के बावजूद उन्हें एक पैसे का क्रेडिट नहीं मिलता है। यदि उनसे पांच फीसदी का भी जीएसटी ले लिया जाए, तो इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के रूप में उन्हें चुकाये गए सभी कर वापस मिल जाएंगे। 
 
 
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मेरठ है पुस्तक प्रकाशन का गढ़

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अंग्रेजों के जमाने से ही मेरठ में पुस्तक प्रकाशन का व्यवसाय शुरू हुआ था और आज यह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में पुस्तक प्रकाशन का गढ़ बन गया है। वहां इस समय 10-15 प्रकाशक तो ऐसे हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं। छोटे-बड़े सभी प्रकाशकों को मिला दिया जाए, तो इसकी संख्या 100 के ऊपर चली जाएगी। 
 
देशभर के प्रकाशकों का मिल रहा सहयोग
रस्तोगी का कहना है कि उन्होंने याचिका भले ही मेरठ प्रकाशक संघ की तरफ से डाली है, लेकिन इस तरह का प्रावधान देशभर के प्रकाशक चाह रहे हैं। इस समय देखें, तो सिर्फ उत्तर भारत में ही दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ, वाराणसी आदि प्रकाशन के बड़े केंद्र हैं।
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