मेरठ प्रकाशक संघ की तरफ से रिट याचिका दायर करने वाले लॉ फर्म खेतान एंड कंपनी के साझेदार अभिषेक ए. रस्तोगी ने अमर उजाला को बताया कि प्रकाशन व्यवसाय पर अभी जीएसटी नहीं लग रहा है, इस वजह से उन्हें 8-10 फीसदी का नुकसान हो रहा है। इसलिए वह चाहते हैं कि उन पर जीएसटी लगाया जाए। यदि उनके ऊपर पांच फीसदी का जीएसटी लगता है तो अभी के मुकाबले उन्हें काफी फायदा होगा।
स्तोगी का कहना है कि प्रकाशकों से भले ही जीएसटी नहीं लिया जा रहा हो, लेकिन वह जो कागज, ग्लू, धागा, गत्ता या स्याही खरीदते हैं, उनके ऊपर जीएसटी चुकाते हैं। कई प्रकाशकों के पास सब तरह की छपाई के लिए मशीन नहीं है, तो वह दूसरे छापेखाने की भी सेवा लेते हैं, जिस पर जीएसटी लगता है। जो उनके रचनाकार (ऑथर) होते हैं, वह तो जीएसटी नहीं चुकाते, लेकिन उनकी तरफ से प्रकाशक को रिवर्स चार्ज मेकेनिज्म के तहत जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है।
प्रकाशक यदि दफ्तर या छापेखाने के लिए किराये या लीज पर बिल्डिंग लेते हैं, तो उस पर जीएसटी देना होता है। छपी किताबों के भंडारण के लिए यदि गोदाम की सेवा लेते हैं, तो उस पर भी जीएसटी देना होता है। इतना कर चुकाने के बावजूद उन्हें एक पैसे का क्रेडिट नहीं मिलता है। यदि उनसे पांच फीसदी का भी जीएसटी ले लिया जाए, तो इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के रूप में उन्हें चुकाये गए सभी कर वापस मिल जाएंगे।
अंग्रेजों के जमाने से ही मेरठ में पुस्तक प्रकाशन का व्यवसाय शुरू हुआ था और आज यह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में पुस्तक प्रकाशन का गढ़ बन गया है। वहां इस समय 10-15 प्रकाशक तो ऐसे हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं। छोटे-बड़े सभी प्रकाशकों को मिला दिया जाए, तो इसकी संख्या 100 के ऊपर चली जाएगी।
देशभर के प्रकाशकों का मिल रहा सहयोग
रस्तोगी का कहना है कि उन्होंने याचिका भले ही मेरठ प्रकाशक संघ की तरफ से डाली है, लेकिन इस तरह का प्रावधान देशभर के प्रकाशक चाह रहे हैं। इस समय देखें, तो सिर्फ उत्तर भारत में ही दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ, वाराणसी आदि प्रकाशन के बड़े केंद्र हैं।