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बदल गया है इलाहाबाद में निवेश का नजरिया

Mon, 05 Nov 2012 09:08 PM IST
नई दिल्ली/इलाहाबाद/रणविजय सिंह
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संगम नगरी के बारे में अब राय बदलने का वक्त है। अब इसे बाबुओं के शहर के रूप में कतई न बुलाएं। निवेश के आंकड़े गवाह हैं कि शहर ने अपना चोला और चाल पूरी तरह से बदल लिया है। शेयर, म्यूचुअल फंड, बीमा और डाकघर में रोजाना 200-250 करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है।
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बैंक जमा के मामले में इलाहाबाद को यूपी में तीसरा नंबर मिला है। इससे ऊपर सिर्फ गाजियाबाद और नोएडा ही हैं। जानकारों का कहना है कि शहर में निवेश की दर 15-20 फीसदी की दर से बढ़ रही है। यही स्थिति रही तो अगले पांच वर्षों में निवेश के क्षेत्र में संगम नगरी कई बड़े औद्योगिक शहरों को पीछे छोड़ देगी। रीयल एस्टेट और सराफे में भी निवेश काफी तेजी से बढ़ा है।

बचत में शहर को तीसरा नंबर
जिले के बैंकों में मार्च 2012 तक इलाहाबादियों के 16,476.84 करोड़ रुपये जमा थे। सितंबर तक यह रकम 17,792 करोड़ तक पहुंच चुकी है। बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का दावा है कि मार्च 2013 तक यह रकम 18 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को भी पार कर सकती है। जबकि, मार्च 2011 तक 14,695.30 करोड़ रुपये और मार्च 2006 तक बैंकों के पास कुल जमा के नाम पर 6,879.41 करोड़ रुपये ही थे। इस रकम में 60 फीसदी हिस्सा एफडी का है। 30 फीसदी बचत खाते और 10 फीसदी चालू खाते की रकम है।  लीड बैंक मैनेजर एचएस पांडे का कहना है कि जिले में बड़ी संख्या कर्मचारियों की है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पहली पसंद सावधि जमा योजनाएं हैं। इसमें निवेश का प्रतिशत इसी रफ्तार से बढ़ा तो अगले दो सालों में इलाहाबाद सूबे में अव्वल हो सकता है। अभी तीसरा स्थान मिला है।
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पहली पसंद शेयर और एमएफ में निवेश
दो साल पहले शेयर मार्केट में आए भूचाल का खौफ इलाहाबादियों के दिलों से निकल चुका है। शेयर बाजार के विशेषज्ञों का दावा है कि 100 से ज्यादा एजेंसियां शहर में शेयर कारोबार में जुटी हैं। इनमें से कोई भी ऐसी एजेंसी नहीं है, जहां एक करोड़ रुपये से कम का कारोबार होता है। 100-125 करोड़ रुपये का टर्नओवर रोजाना यानी करीब 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का मासिक टर्नओवर हो रहा है। म्यूचुअल फंड में भी रोजाना चार-पांच करोड़ रुपये आ रहे हैं। आनंद राठी शेयर एंड ब्रोकिंग कंपनी के क्लस्टर हेड शरद प्रकाश अग्रवाल बताते हैं कि शहर में लिक्विड फंड के जरिए शेयर मार्केट में ज्यादा निवेश हो रहा है। म्युचुअल फंड के निवेश एसआईपी के रास्ते हो रहे हैं। वजह यह है कि, लोग निवेश की रकम के साथ रिस्क नहीं लेना चाहते। मार्केट के अच्छा होने की उम्मीद में निवेश की रकम और बढ़ सकती है।

दोगुनी रफ्तार से बढ़ा रीयल एस्टेट में निवेश
शहर का रीयल एस्टेट कारोबार पांच सालों में दोगुनी गति से बढ़ रहा है। मांग का ही असर है कि इलाहाबाद जैसे शहर में एक करोड़ रुपये तक के फ्लैट बिकने लगे हैं। बिल्डर संजीव अग्रवाल कहते हैं कि फ्लैट कल्चर स्वीकार हो गया है। शहर में इस समय करीब 10 बड़े हाउहिसंग प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है और एडीए से सात और स्वीकृत हो चुके हैं। इसके हर साल 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी होने की संभावना है। मौजूदा रीयल एस्टेट मार्केट सालाना 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुंच गया है। रीयल एस्टेट सौदों में आ रही तेजी का जिक्र करते हुए एआईजी (स्टांप) वीके सिंह बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष में 230 करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी के कलेक्शन का लक्ष्य है। 111 करोड़ रुपये आ चुके हैं। पिछले सालों में लक्ष्य से ज्यादा आय हुई है। इस बार भी लक्ष्य पूरा हो जाएगा।

बीमे में यूलिप ने तोड़ा भरोसा
शेयर मार्केट लुढ़कने के कारण बीमा की यूलिप योजनाओं में भारी घाटा झेल चुके लोगों ने निवेश का ढर्रा बदल लिया है। अब शेयर मार्केट से जुड़ी योजनाओं में रकम लगाने के बजाय लोग ट्रेडिशनल प्लान में निवेश कर रहे हैं। निगम के कॉरपोरेट क्लब सदस्य और मुख्य बीमा सलाहकार बृजेश मिश्रा बताते हैं कि उठापटक के बाद बीमा व्यवसाय में रौनक लौट चुकी है। एलआईसी ने पिछले साल 190 करोड़ रुपये की प्रीमियम वसूली के साथ 3.42 लाख पॉलिसियां बेची हैं। निजी कंपनियों ने भी 12 हजार पॉलिसी बेचकर 23-24 करोड़ रुपये वसूले। चालू वित्त वर्ष में एलआईसी में 1.50 लाख और निजी क्षेत्र की कंपनियों में नौ हजार पॉलिसियों के जरिये करीब 125 करोड़ रुपये लगे हैं।

मैग्मा एचडीआई जेनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के सीईओ स्वराज कृष्णन ने अमर उजाला को बताया कि कंपनी छोटे शहरों में जेनरल इंश्योरेंस सेक्टर में तेजी से कारोबार बढ़ाने की तैयारी कर रही है क्योंकि सबसे अधिक ग्रोथ और रिटर्न छोटे शहरों से ही आएगा। इन शहरों के ग्राहकों को मेट्रो शहरों की तरह सुविधाएं दी जाएंगी और उनकी जरूरतों के अनुरूप उत्पाद भी पेश किए जाएंगे, क्योंकि आनेवाला समय छोटे शहरों का है। बीमा क्षेत्र की कंपनियां छोटे शहरों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीतियां बना रही हैं।

डाक बीमा योजनाओं से बिदके निवेशक
बैंकों की जमा दर में बढ़ोतरी होते ही निवेशकों ने डाक विभाग की योजनाओं से किनारा कसना शुरू कर दिया है। वित्त वर्ष 2009-10 में 425 करोड़ रुपये जमा हुए। 2011-12 में यह रकम घटकर 241 करोड़ रुपये पर अटक गई। इस साल सितंबर तक सिर्फ 54.77 करोड़ रुपये ही डाकघर की योजनाओं में जमा हुए हैं। जिला बचत अधिकारी गोपाल श्रीवास्तव मानते हैं कि बैंक की जमा दरों के कारण निवेशकों के रुख में बदलाव आया है।

सोने-चांदी के निवेश में बढ़ी रुचि
सोना-चांदी अब केवल जेवर के रूप में ही नहीं खरीदे जा रहे हैं। शहरियों के बीच यह निवेश का भी जरिया बन गया है। सराफा कारोबारियों का दावा है कि शेयर और रीयल एस्टेट में निवेश के बाद यह दूसरा बड़ा हिस्सा है, जिसमें लोग रकम लगा रहे हैं। इसमें सोने, चांदी, हीरे और प्लेटेनियम की खरीदारी की जा रही है। वजह, दो सालों में मिला दोगुना रिटर्न मिलना है। अनुमान है कि पिछले साल 500 करोड़ से ज्यादा की बिक्री हुई है। प्रयाग सराफा मंडल के अध्यक्ष कुलदीप सोनी का बताना है कि सराफा मार्केट के साथ ही बैंक और डाकघरों से सोने के सिक्कों की बिक्री हो रही है। ब्रांडेड ज्वेलरी के आने से भी निवेशकों का भरोसा सोने में बढ़ा है और उनके निवेश में भी बढ़ोतरी हुई है।
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