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बहुत कठिन है डगर 'डिलीवरी ब्वॉयज' की

Sun, 06 Mar 2016 12:58 AM IST
खुशबू दुआ /मुंबई से, बीबीसी
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भारत में इंटरनेट शॉपिंग का धंधा फल-फूल रहा है। लेकिन इस माध्यम से खरीदे जाने वाले सामान को आपके घर पहुंचाने वाले 'डिलीवरी ब्वॉयज' के हिस्से में इस मुनाफ़े का एक प्रतिशत भी नहीं आता।
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'ई कॉमर्स' इंडस्ट्री के आंकड़ों को माने तो भारत में रोज़ाना अलग अलग वेबसाईट्स से खरीदे गए 10 लाख से ज़्यादा 'पैकेज' पहुंचाए जाते हैं। इस आंकड़े में फ़ूड डिलीवरी शामिल नहीं है। इस आंकड़े से एक बात सामने आती है कि भारत में एक ही दिन लाख़ों लोग 'डिलीवरी ब्वॉयज़' के रूप में सड़कों पर उतर आते हैं।

21 साल के आशीष कुमार 'केएफसी रेस्तरां' में पिछले कुछ महीनों से डिलीवरी का काम करते हैं। उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं बरेली से ग्रेजुएशन कर रहा हूं लेकिन आर्थिक तंगी के चलते कॉलेज से परमिशन लेकर यहां काम करने आ गया हूं।"
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आशीष के मुताबिक वे इस काम को इसलिए कर रहे हैं कि अभी भागदौड़ करने लायक हैं। इसी बहाने उन्हें मुंबई घूमने को मिल जाता है। उन्हें यह उम्मीद भी है कि शायद कभी किसी ऑर्डर के बहाने किसी फ़िल्मी सितारे से भी मुलाक़ात हो जाए। एक बड़े रेस्तंरा से जुड़े होने के कारण उन्हें मेडिकल और दुर्घटना बीमा दिया गया है। वे कुछ पैसे कमाने के बाद बरेली वापस जाने की ख़्वाहिश रखते हैं।

आसान नहीं डिलवरी ब्वॉय की ज़िंदगी

लेकिन हर डिलवरी ब्वॉय की ज़िंदगी इतनी आसान नहीं होती। लखनऊ के रहने वाले राजू कुमार अपने पिता के कपड़ों की दुकान पर काम करते थे। लेकिन, इससे दुकान का खर्च ही बमुश्किल निकल पाता है।

कुछ नया करने की कोशिश में राजू ने बाईक खरीदी। उन्हें बाईक होने की शर्त पर फ़िल्पकार्ट में सामान पहुंचाने का काम मिला। राजू बताते हैं,"मैं फ़िल्पकार्ट में अच्छा काम कर रहा था। लेकिन फिर मेरी बाईक चोरी हो गई। वहां काम करने के लिए आपके पास अपनी बाईक होनी जरूरी है। बाईक नहीं रही तो मुझे नौकरी से निकाल दिया गया।"

अब राजू फ़ूड डिलीवरी कंपनी 'फ़ासोस' में डिलीवरी बॉय का काम करते हैं। यहां उन्हें बाईक, मेडिकल बीमा, बाइक की देख रेख का खर्च और पेट्रोल कंपनी की ओर से मिलता है। उन्होंने बीबीसी से कहा,"मुझे कंपनी से 9,000 रुपए हर महीने मिल जाते हैं। मैं बहुत खुश हूं।"लेकिन 9 हज़ार की नौकरी और वह भी बाईक पर निर्भर? क्या यह तरीका सही है? क्या यह श्रम नियमों के ख़िलाफ नहीं है?
 

'डिलीवरी ब्वॉयज के लिए काफ़ी कुछ किया जाना है'

'आईशेफ' और 'वॉक इन बॉक्स' जैसी बड़ी फ़ूड डिलीवरी कंपनियों के मालिक चिराग आर्य मानते हैं, "यह बिल्कुल सही है कि अभी डिलीवरी ब्वॉयज के लिए काफ़ी कुछ किया जाना है। अभी उनके लिए एक पूरा विकास मॉडल बनाया जाना है ताकि वो अपने करियर को बेहतर बना सकें।"

'स्नैपडील' में डिलीवरी का काम देखने वाले सीनियर असोसिएट गौरव भारद्वाज बताते हैं,"डिलवरी ब्वॉयज के काम के साथ एक परेशानी यह है कि ज़्यादातर कंपनियां इन्हें हायर नहीं करती बल्कि वो इस काम के लिए किसी कूरियर या मैन पॉवर कंपनी से करार कर लेती है। ऐसे में इन डिलवरी ब्वॉयज के काम की शर्तों और नियमों के पालन में किसी कंपनी का सीधा सीधा हाथ नहीं होता।" उन्होंने बीबीसी से कहा, "स्नैपडील में हम एक कूरियर कंपनी के जरिए अपने पैकेज ग्राहकों को भिजवाते हैं। इस कूरियर कंपनी के राईडर्स को स्नैपडील का बैग या वर्दी दे दी जाती है। इससे ज़्यादा हम डिलीवरी ब्वॉयज से संपर्क नहीं रखते।"

लेकिन गौरव मानते हैं कि यह एक उभरता हुआ करियर विकल्प है। जैसे जैसे ई कॉमर्स का बाज़ार बड़ा होगा, डिलीवरी ब्वॉयज की मांग भी बढ़ेगी। इस काम में भविष्य की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं,"एक डिलीवरी ब्वॉय की सैलरी 8 से 12 हज़ार के बीच होती है और फिर ज़्यादा पैकेज डिलीवर करने पर उन्हें फ़ायदा भी मिलता है ऐसे में सिर्फ़ आपके पास ग्रेजुएशन की डिग्री और वैध ड्राईविंग लाईसेंस होना चाहिए। इसके बाद तो डिलिवरी ब्वॉयज की इतनी मांग है कि कंपनी ख़ुद ही आपको बाईक दिला देती है या फिर आपकी बाईक ख़रीदने में मदद कर देती है।" अनुभवी डिलीवरी ब्वॉयज को 20 हज़ार तक भी तनख़्वाह मिल जाती है। कई बार वो अपना करियर बदल भी लेते हैं।
 

ग्राहकों का रवैया डिलीवरी ब्वॉयज के प्रति काफ़ी खराब

भारत में लोकप्रिय रेस्तरां 'मैकडॉनल्ड्स' पश्चिम और दक्षिण भारत में कुल 113 शाखाओं से 'मैक डिलीवरी सर्विस' देता है। 'मैकडॉनल्ड्स' के भारत पश्चिम और दक्षिण के वाईस प्रेसीडेंट रंजीत पलिअथ बताते हैं,"स्मार्ट फ़ोन्स की वजह से डिलीवरी सर्विसेज में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।

पश्चिम और दक्षिण भारत में हमारे पास 40 प्रतिशत डिलीवरी ऑनलाइन आर्डर होती हैं।" वे बताते हैं, "हम जानते हैं कि डिलीवरी पूरे व्यापार का एक महत्वपूर्ण अंग है। हम मैकडॉनल्ड्स डिलीवरी के लिए युवा ग्रेजुएट और पहली बार नौकरी करने वालों को रखते हैं। हम उन्हें ट्रेनिंग देते हैं और कई बार अच्छा काम कर रहे डिलीवरी बॉयज को दूसरे करियर के लिए भी प्रेरित और मदद करते हैं।" हालांकि इस काम में कई चुनौतियां भी सामने आती हैं। इनमें प्रमुख है ग्राहकों का बर्ताव।

बैंगलुरू से मुंबई आए इमरान बताते हैं,"मैं अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए 'होलाशेफ' के लिए डिलीवरी करता हूं। लेकिन कई बार ग्राहक अपना गुस्सा हम पर निकालते हैं, जैसे हम इंसान नहीं और बस उनकी सुनने के लिए हैं।" वे आगे कहते हैं,"हमें सख़्त आदेश होते हैं कि हम किसी भी हालत में ग्राहक को जवाब न दें।"

स्नैपडील के गौरव भी बताते हैं,"कई बार ग्राहकों का रवैया डिलीवरी ब्वॉयज के प्रति काफ़ी खराब होता है। सर्विस में कमी, उत्पाद के पहुंचने में देरी या उत्पाद में खराबी का सारा गुस्सा डिलीवरी ब्वॉय पर उतरता है, जिसको शायद यह भी मालूम नहीं होता कि आपने मंगवाया क्या है।"
 
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पैसे छीन लेने की घटनाएं भी सामने आई हैं

आईशेफ के चिराग बताते हैं,"डिलीवरी ब्वॉयज के साथ मारपीट या उनसे पैसे छीन लेने की घटनाएं भी कई बार सामने आई हैं। यह इस काम से जुड़ा जोखिम है, जो वो उठाते हैं।" हालांकि 'डिलीवरी ब्वॉयज' की ओर से भी कई बार सामान चोरी करने, बाईक वापिस न दिए जाने, ग्राहकों से झगड़ा करने और झूठी लूट की खबरों के मामले सामने आते हैं।

इसी कारण से अब 'डिलीवरी ब्वॉय' बनने के लिए अधिकतर कंपनियों ने ग्रेजुएशन डिग्री होना जरूरी कर दिया है। चिराग कहते हैं,"डिलीवरी ब्वॉयज को सही व्यवहार की ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें ट्रैफ़िक नियम भी सिखाए जाते हैं। उन्हें कुछ कानून भी समझाते जाते हैं ताकि वो गलती न करें।"

यह सही है कि इस काम को अभी उतनी सम्मानजनक नज़रों से नहीं देखा जाता। लेकिन पढ़ाई के ख़र्चे के लिए जूझ रहे छात्रों और कहीं नौकरी नहीं ढूंढ पा रहे युवाओं के लिए 'डिलीवरी ब्वॉय' बनना एक उपयोगी करियर ऑप्शन बन कर उभर रहा है।
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