पारंपरिक बाजार के मुकाबले सस्ती खरीदारी के लिए विख्यात ऑनलाइन शॉपिंग महंगी हो सकती है। दरअसल, सरकार ई-कॉमर्स क्षेत्र को भी सेवा कर के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है। हो सकता है कि इससे संबंधित प्रस्ताव आगामी बजट में शामिल हो जाए।
भारत में तेजी से बढ़ते ई कॉमर्स क्षेत्र ने एक ओर जहां पारंपरिक बाजार (ब्रिक एंड मोर्टार) की नींद उड़ा दी है वहीं दूसरी ओर सरकार ने ई कॉमर्स इसके जरिये राजस्व बढ़ाने के तरीके को ढूंढना शुरू कर दिया है।
वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक ऑनलाइन रिटेल में कई ऐसी सेवाएं शामिल हैं, जिन पर सेवा कर देय होता है। लेकिन ऑनलाइन कंपनियां इसे नहीं चुकाती हैं।
सेवा कर के लिए कवायद जारी
ई कॉमर्स क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अथॉरिटी ऑफ एडवांस रूलिंग में इससे राहत तो दी थी, लेकिन उसमें कहा गया था कि ई कॉमर्स कंपनियां सेवा कर भले ही नहीं दें, लेकिन कंपनियां इसमें पंजीकरण अवश्य कराएं।
सेवा कर विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक इस क्षेत्र की अधिकतर कंपनियों ने सर्विस टैक्स रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं लिया है।
केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीइसी) के एक अधिकारी ने बताया कि ई कामर्स क्षेत्र में काम कर रही कंपनियां क्या-क्या सेवाएं उपलब्ध कराती हैं और उस पर कैसे सेवा कर वसूला जा सकता है, इस बारे में कवायद चल रही है।
कंपनियों को उपलब्ध कराते हैं गोदाम
अभी तक जो पता चला है, उसके मुताबिक ऑनलाइन कंपनियां विक्रेताओं को एक गोदाम उपलब्ध कराती हैं जहां सामान रखा जाता है और ऑर्डर के मुताबिक उसे पैक करके कूरियर के जरिये भेजा जाता है। इसमें वेयरहाउस, पैकेजिंग और कूरियर सेवा पर सर्विस टैक्स बनता है।
कुछ कंपनियां बाहर की कूरियर कंपनी की सेवा लेती हैं, तो वह तो सेवा कर दे देती हैं लेकिन कुछ कंपनियों की अपनी ही कूरियर सेवा है। जैसे फ्लिपकार्ट ने ई-कार्ट नाम से कूरियर सेवा शुरू कर दी है। इसके अलावा ऑनलाइन कंपनियां विक्रेताओं से कमीशन भी लेती हैं, उस पर भी सेवा कर बनता है।
बजट प्रस्ताव में किया जाएगा शामिल
सेवा कर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस समय सर्वे चल रहा है। कौन सी कंपनी किस तरह से सेवा उपलब्ध करा रही है, इस पर रिसर्च चल रहा है। इसकी रिपोर्ट तैयार कर मंत्रालय में भेजा जाएगा। उनके मुताबिक इसे बजट प्रस्ताव में भी शामिल किया जा सकता है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत में अभी ई कॉमर्स करीब 140 अरब रुपये का हो गया है, जबकि दो साल पहले यह महज 3,660 करोड़ रुपये का था। जिस हिसाब से इस क्षेत्र का विकास हो रहा है, उसके मुताबिक यह वर्ष 2020 तक 1952 अरब रुपये का हो जाएगा।