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आप 'किराना' खरीदते हैं या 'ग्रॉसरी'?

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इस सदी के शुरुआती दशक तक लोग दिवाली या क्रिसमस पर अपने मनपसंद उत्पाद जैसे टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन पर अपने करीबी रिटेलर द्वारा दी जाने वाली 'धमाका सेल' या 'बंपर छूट' का इंतजार करते थे।
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लेकिन 'स्नैपडील', 'एमेजॉन' और 'फ्लिपकार्ट' जैसी ई कॉमर्स वेबसाइट के आ जाने से अब हर दिन सेल लगने लगी है।

इंटरनेट ने सामान की खरीद फरोख्त को इतना आसान और किफायती बना दिया है कि अब बाजारों में भीड़ कम और इंटरनेट पर ट्रैफिक ज्यादा होने लगा है।

लेकिन क्या वाकई में आने वाले साल में ऑनलाइन खरीददारी से बाजारों में सामान बेचने वाले दुकानदार हार जाएंगे?

1 लाख से अधिक स्टार्ट अप हुए शुरू

भारत में पिछले 10 सालों में 1 लाख से ज्यादा ऑनलाइन स्टार्ट अप शुरू हुए हैं और इनमें से अधिकांश किसी न किसी तरह की सेवा या वस्तु का विक्रय कर रहे हैं।

स्नैपडील, एमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसे बड़े नामों को छोड़ भी दें तो भी ऑनलाइन सामान बेचने वाली अनगिनत वेबसाइट्स इंटरनेट यूजर्स के सामने हैं जहां आपको अपनी हर जरूरत का सामान मिल सकता है।

आपके माउस के एक क्लिक पर आपके अंडरगार्मेंटस से लेकर आपकी गाड़ी तक आपके घर के सामने खड़ी हो सकती है और यह सब संभव हुआ है इंटरनेट के बाजारीकरण से।

रिटेल बाजार घबराए

स्नैपडील में काम करने वाले गौरव बताते हैं, "इंटरनेट पर सामान बेचने से एक विक्रेता को न शोरूम की जरूरत होती है न किसी सेल्समैन की, बस उत्पाद की तस्वीर और उसकी कीमत से काम चल जाता है। ऐसे में विक्रेता का जो बिजली - किराए का खर्चा बचता है उसे वह ग्राहक को डिस्काउंट के रूप में देता है और इसलिए इंटरनेट शॉपिंग आज सबसे लोकप्रिय माध्यम है।"

लेकिन इस 'ई-कॉमर्स' के खेल में जहां ग्राहक और ऑनलाइन विक्रेता की चांदी है वहीं घाटे में जा रहे रिटेल ग्राहक इसे बाजारों का अंत मानते हैं।

शोरूम से नहीं खरीदते टीवी, फ्रिज

बीते साल पूरी तरह से अपने इलेक्ट्रॉनिक गुडस् के बाजार को समेट चुके 'ई जोन' के प्रकाश भंडारी कहते हैं, "हम पहले ही क्रोमा और विजय सेल्स जैसे पुराने ब्रांड्स से जूझ रहे थे और फिर ऑनलाइन साइट्स ने भारी डिस्काउंट्स देकर हमारी कमर तोड़ दी।"

वो बताते हैं, "ग्राहक टीवी या फ्रिज का मॉडल देखने आते हैं और फिर दाम सुन कर पूछते हैं, ऑनलाइन तो यह इतने का मिलता है, आपके पास इतना महंगा क्यों?"

यही किस्सा अंबिका जनरल स्टोर के मालिक राम बिधूड़ी भी सुनाते हैं, "हमने भी अब फोन पर ऑर्डर लेने शुरू कर दिए हैं लेकिन सामान पर इतना डिस्काउंट कैसे दे पाएंगे, दुकान का किराया भी तो निकालना है।"

अब लोग संगीत नहीं खरीदते

लेकिन ई कॉमर्स से प्रभावित होने वाले सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक या किराना दुकाने ही नहीं हैं, हाल ही में मुंबई के ऐतिहासिक म्यूजिक स्टोर 'रिदम हाउस' के बंद होने का कारण भी ऑनलाइन स्टोर से प्रतिद्वंद्विता थी।

इस स्टोर के मालिक महमूद कर्माली ने बीबीसी से कहा, "कुछ पुराने ग्राहकों को छोड़ दें तो अब लोग संगीत खरीदने नहीं आते और इसलिए हम भी रिदम हाउस को ऑनलाइन करने वाले हैं।"

रिदम हाउस का जाना संगीत प्रेमियों के लिए एक युग का अंत है और हरिप्रसाद चौरसिया से लेकर शंकर महादेवन तक ने इस स्टोर के बंद होने को ऑनलाइन शॉपिंग का अभिशाप माना था लेकिन बाजार बहुत बेदर्द होता है और ग्राहक बहुत स्वार्थी और यहां भावनाओं से काम नहीं चलता। मामला सुविधा और डिस्काउंट से जुड़ा है।

'ऑनलाइन बाजार भविष्य हैं'

वॉक इन बॉक्स, मिंत्रा और हाल ही में घर पर कच्ची सब्जियां भेजने वाली 'आई शेफ डॉट कॉम' शुरू करने वाले चिराग कहते हैं, "ऑनलाइन बाजार भविष्य हैं और इसे नकारा नहीं जा सकता।"

वो आगे कहते हैं, "लोगों के पास समय कम है और वो हर चीज घर पर डिलीवर करवाना चाहते हैं और यहीं ऑनलाइन बाजार बाजी मार ले जाते हैं। आप सुबह 6 बजे ऑर्डर दें या रात 2 बजे आपको सामान आपके बताए समय पर मिल जाएगा।"

स्नैपडील के काम करने वाले गौरव भारद्वाज भी कहते हैं, "आप भावुक होकर सोचेंगे तो आपको बहुत दुखद हालात दिखाई देंगे लेकिन असलियत कुछ और है।"

ऑनलाइन मिलता है भारी डिस्काउंट

गौरव बताते हैं, "ऐसा नहीं है कि दुकानदार आपको भारी छूट नहीं दे सकते लेकिन वो अपना मार्जिन कम करने को तैयार नहीं हैं, वहीं ई कॉमर्स वेबसाइट पांच प्रतिशत के मुनाफे पर भी सामान बेचने को तैयार हैं।"

अपने काम पर थोड़ी और रोशनी डालते हुए वो बताते हैं, "हमारे साथ सामान की सप्लाई करने के लिए असल दुकानदार ही जुड़ते हैं और वो एक बड़े ग्राहक बाजार (ऑनलाइन) में कूदने के लिए हमारे साथ टाई अप कर लेते हैं और जो सामान आप दुकान पर मोलभाव कर 100 रुपए में खरीदेंगे उसे वो ऑनलाइन 80 रुपए में उपलब्ध करवा देते हैं।"

इन दलीलों को देखकर ऑनलाइन शॉपिंग मुनाफे का सौदा लगता है लेकिन ऑनलाइन खरीददारी के अपने नुकसान भी हैं, जैसे अक्सर ऑनलाइन खरीददारी में आने वाले सामान की क्वालिटी की शिकायत की जाती है।

नकल ब्रांड भेजने के भी हैं मामले

इसके अलावा ब्रांडेड वस्तु के बदले उस ब्रांड की नकल वाला सामान भेजने के भी कई मामले सामने आए हैं। ऐसे में उन ग्राहकों की भी कमी नहीं है जो अपने सामने चीज को ठोक बजा कर खरीदना पसंद करते हैं और ऑनलाइन बाजारों पर भरोसा नहीं करते।

हाल ही में 'आस्क मी बाजार' के द्वारा दिए गए कुछ खराब उत्पादों के कारण इस वेबसाइट का प्रमोशन करने वाले अभिनेता फरहान अख्तर भी निशाने पर आए थे और उन्होंने माना था कि खरीददारी से पहले चीज को परखना सही बात है।

फरहान अख्तर ने भी झेली आलोचना

फरहान ने बीबीसी से कहा था, "हम विज्ञापन करते हैं लेकिन सर्विस देना और उत्पादों की गारंटी देना कंपनी का काम है और ऐसे में सिर्फ सिलेब्रिटी के कह देने भर से किसी चीज को आंका नहीं जाना चाहिए आप उसे खुद भी एक बार परख लें तो बेहतर है।"

सिक्के के इस पहलू को देखें तो बाजारों का पलड़ा ऑनलाइन शॉपिंग पर भारी पड़ता नज़र आता है।

ऐसे में यह कहना आसान नहीं है कि 'ऑनलाइन' या 'रियल' शॉपिंग में क्या ज्यादा बेहतर है लेकिन यह तय है कि आने वाले साल में भारत में इंटरनेट यूजर्स की तेजी से बढ़ती संख्या के साथ ऑनलाइन बाजारों का विस्तार भी अवश्य होगा।
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'ताजी चाय के लिए दुकान पर ही आएंगे'

लेकिन विशेषज्ञ, सिलेब्रिटी और दुकानदार एक सुर में मानते हैं कि बाजारों का अस्तित्व मिट जाएगा ये मुमकिन नहीं है और इसका एक अच्छा उदाहरण मुंबई के बांद्रा इलाके में चाय की दुकान चलाने वाले सुरेश मेहसाणा अपने शब्दों में कुछ यूं देते हैं, "साब जी, कितना ही कंप्यूटर लगा लो, गरम और ताजी चाय पीने तो लोग दुकान पर ही आएंगे न, वर्ना मशीन तो आपके ऑफिस में भी होगी ?"
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