ज्यादातर कंपनियां फेस्टिव सीजन में ही कैशबैक का ऑफर लेकर के आती हैं। ये इसलिए होता क्योंकि साल भर के मुकाबले अक्टूबर से लेकर के दिसंबर के बीच ज्यादा सेल होती है। कंपनियों का साल भर का पूरा ऐवरेज इन तीन महीनों में निकल जाता है। सेल को बढ़ाने के लिए यह ऑफर निकाले जाते हैं और इसके लिए प्रचार-प्रसार भी खूब किया जाता है।
खरीदना होता है ज्यादा सामान
कैशबैक के चक्कर में लोग ज्यादा सामान भी खरीद लेते हैं, जिनकी उन्हें जरुरत भी नहीं होती है। उदाहरण के तौर पर 5 हजार रुपये का सामान खरीदने पर 500 का कैशबैक ऑफर आता है या फिर कंपनियां डिनर सेट और अन्य प्रकार के गिफ्ट भी रखती हैं। इससे लोगों को लगता है कि वो ज्यादा खरीददारी करके एक जरुरत का सामान फ्री में घर ले जा सकेंगे। लेकिन अगर आप उस उत्पाद की वास्तविक कीमत को चेक करेंगे तो हकीकत में उतना सामान खरीदने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
बैंक और कंपनियों का होता है सबसे ज्यादा फायदा
ई-कॉमर्स कंपनियां, डिपार्टमेंटल स्टोर्स, रिटेल शॉप से बैंकिंग और फाइनेंस कंपनियां अपनी सेल बढ़ाने के लिए कैश-बैक ऑफर को लेकर टाईअप करती है। इसके पीछे जो एजेंडा होता है कि उपभोक्ताओं से अधिक खर्च कराना।
इसके एवज में कंपनियां एक निश्चिचत फीसदी रकम उस बैंक या फिर एनबीएफसी कंपनियों को देती हैं जिससे उपभोक्ता खरीददारी करते हैं। इससे कंपनी और बैंक दोनों का फायदा होता है। कंपनी की अधिक से अधिक खरीददारी होती है और उससे बैंक को एक फिक्स कमीशन मिल जाता है। बैंक इसमें से कुछ भाग कार्ड होल्डर को रिवार्ड प्वाइंट या कैश-बैक के तौर पर पास कर देती है।