सौरभ सान्याल ने अमर उजाला से कहा कि देश की आर्थिक गाड़ी को दोबारा पटरी पर दौड़ाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार विश्व बैंक या आईएमएफ के माध्यम से कर्ज ले सकती है।
इस निवेश से औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार बढ़ेगी। फैक्ट्रियों के चलने से करोड़ों मजदूरों-कामगारों के हाथ में पैसा जाएगा। इससे मांग में बढ़ोतरी होगी और अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी।
पहले से ही मंदी झेल रहे उद्योगों को 24 मार्च से घोषित लॉकडाउन में भी मजदूरों को वेतन देने और उनकी व्यवस्था देखने के लिए कहा गया। लेकिन कई कमजोर संगठन टूट गए और अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं दे पाए।
इससे लाखों लोगों की छंटनी हुई और बेरोजगारी से मजदूरों के हाथ में पैसे की कमी हुई। इससे मांग में भी भारी कमी दर्ज की गई। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि आर्थिक पैकेज के जरिए दोनों क्षेत्रों के हितों की रक्षा की जा सकती है।
भारतीय मजदूर संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनीश मिश्रा ने कहा कि उद्योगों को राहत देने के नाम पर गरीब मजदूरों के हितों की अनदेखी की जा रही है। शुक्रवार को वे गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर इस पर विरोध जता चुके् हैं। अगर सरकार ने मजदूरों के हित में कदम नहीं उठाया, तो वे इस पर व्यापक रणनीति बनाकर विरोध दर्ज कराएंगे।
द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने कहा कि कोविड जैसी स्थिति में जब मजदूरों के हितों की सबसे ज्यादा रक्षा की जानी चाहिए थी, उन्हें उद्योगों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है।
अब न तो उनके हितों के लिए कोई आवाज उठाई जा सकती है और न ही उनके हितों की चोट पर कोई कानूनी मदद ली जा सकती है। यह देश के करोड़ों मजदूरों के हितों के साथ खिलवाड़ है।
कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के दीपांकर भट्टाचार्या ने कहा कि केंद्र सरकार स्वयं को मजदूरों और गरीबों की हितैषी बताती है। लेकिन उसका हर फैसला उद्योगपतियों को बचाने वाला उठ रहा है।
बड़े-बड़े उद्योग संगठनों को लाखों करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया जा रहा है, जबकि उसी दौरान श्रम कानूनों में बदलाव करके गरीबों के हितों को चोट पहुंचाई जा रही है।
सरकार को समझना चाहिए कि संतुष्ट मजदूर उसके लिए ज्यादा उत्पादक और मांग बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
मजदूर कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता अमित सिन्हा के मुताबिक राज्यों ने अध्यादेश के जरिए अधिकतम तीन साल के लिए श्रम कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन इस दौरान भी न्यूनतम मजदूरी, बाल मजदूरी निषेध, सुरक्षा और बंधुआ मजदूरी जैसे कानूनों को जारी रखने के विषय में निर्णय लिया गया है।
कुछ जगहों पर काम के घंटे बढ़ाए गए हैं, लेकिन इस विषय में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हो सकते हैं। कुछ राज्यों ने इसके लिए अतिरिक्त वेतन देने की बात कह दी है।