देश में अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में आजादी के बाद सबसे बड़े कर सुधार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद अक्तूबर एवं नवंबर में कर राजस्व संग्रह में लगातार कमी होने से केंद्र सरकार की परेशानी बढ़ गई है।
राजस्व वसूली में कमी का राज्य सरकारों की आर्थिक सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि यदि वसूली में कमी होती है, तो उन्हें केंद्र सरकार की तरफ से न केवल चालू वित्त वर्ष में बल्कि अगले पांच वर्षों के दौरान भी उसकी भरपाई कर दी जाएगी। इस तरह कर वसूली में कमी से केंद्र दोहरी मुसीबत में दिख रही है।
इसलिए इस स्थिति से निबटने के लिए रणनीति बनाने की शुरुआत हो गई है। यही नहीं, सरकार ने जीएसटी परिषद की 25वीं बैठक आयोजित करने के लिए तिथि की भी घोषणा कर दी है, ताकि यदि कोई बड़ा फैसला लेना हो, तो उस पर जीएसटी परिषद की अनुमति भी ले ली जाए।
सरकार के लिए दोहरी मुसीबत
वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि जीएसटी मद में वसूली घटना केंद्र सरकार के लिए दोहरी मुसीबत इसलिए है, क्योंकि एक तो उसका कर राजस्व घट रहा है और दूसरी तरफ उसे राज्यों को भी राजस्व में हुई कमी की भरपाई करनी होगी। यदि कर राजस्व से पैसा पूरा नहीं पड़ेगा तो इसका इंतजाम दूसरे स्रोतों से करना होगा, जिसका असर राजकोषीय घाटे पर पड़ सकता है।
राजकोषीय मोर्चे पर संकट में सरकार
राजकोषीय मोर्चे पर सरकार पहले से ही संकट में है। चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.2 फीसदी तक राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय किया है। इसे संयोग कहें या दुर्योग, इस वर्ष अप्रैल से अगस्त के बीच ही राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के 96.1 फीसदी राशि का व्यय हो चुका था, क्योंकि सरकार का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इससे एक साल पहले का आंकड़ा देखें, तो उस वर्ष अप्रैल से अगस्त के बीच राजकोषीय घाटे के 76.4 फीसदी के बराबर राशि का व्यय हुआ था।
कर अधिकारियों की सतर्कता और बढ़ेगी
केंद्र सरकार के अप्रत्यक्ष कर विभाग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जीएसटी प्रणाली में कारोबारियों को जितनी छूट दी गई है, शायद उसकी जरूरत नहीं है। छूट और आजादी ही वह कारण है, जिससे जीएसटी की वसूली लगातार दूसरे महीने घटी है। इसलिए अब केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्यों के अप्रत्यक्ष विभाग के अधिकारियों को भी सतर्क करना होगा, ताकि वे ऐसे कारोबारियों पर नजर रख सकें, जो सही-सही कर का भुगतान नहीं कर रहे हैं।