उद्योग जगत ने स्वेच्छा से आरक्षण नीति का पालन न किया तो सरकार को उठाने पड़ेंगे आवश्यक कदम
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केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान जल्द ही निजी क्षेत्र के रोजगारों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के लिए मुहिम चलाएंगे, जिसका असर कारपोरेट जगत के अलावा आने वाले उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनावों में भी दिखेगा। अमर उजाला के साथ एक विशेष बातचीत में पासवान ने कहा कि निजी क्षेत्र में दलितों के लिए आरक्षण जरूरी है और मैं जल्द ही कारपोरेट जगत से इस बारे में बात करूंगा।
उन्होंने बताया कि वह इस दिशा में कई दिनों से सोच रहे थे पर अब वह जल्द ही इसके लिए सर्वसम्मति बनाने का प्रयास शुरू करेंगे। पासवान ने कहा कि यह प्राइवेट सेक्टर कंपनियों के हित में होगा कि वे समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन स्तर को संवारने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि ‘अमीरी का कैलाश और गरीबी का पाताल’ ज्यादा दिन नहीं चलेगा।
पासवान का मानना है कि निजी कंपनियों में आरक्षण कारपोरेट जगत के ही हित में है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में दलितों, शोषितों और वंचितों को रोजगार दे कर ही नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या को सुलझाया जा सकता है। सामाजिक न्याय के बगैर देश में खुशहाली और अमन-चैन नहीं आ सकता है और यह सिर्फ सरकार या सरकारी उद्यमों की जिम्मेवारी नहीं हो सकती है। पासवान ने कहा कि अब तक कारपोरेट जगत अपने इस दायित्व से पीछा छुड़ाता रहा है, पर वक्त आ गया है कि वे भी अब समाज के वंचितों के उत्थान में सरकार का साथ दें।
निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार ने इस विषय को 2006 में ही उठाया था। उस वक्त इंडस्ट्री चैंबर्स ने इसका घोर विरोध किया था। सीआईआई जैसे उद्योग संगठन ने कहा था कि निजी क्षेत्र पर सरकार को आरक्षण नहीं थोपना चाहिए। इसके साथ ही उसने स्वेच्छा से सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन) की बात की थी। उद्योग जगत की उदासीनता और उस वक्त की सरकार के कमजोर रवैये के कारण निजी क्षेत्र में आरक्षण का मामला धरा का धरा रह गया। पासवान का कहना है कि अगर उद्योग जगत स्वेच्छा से आरक्षण नीति का पालन नहीं करेगा तो सरकार को दलितों के हित के लिए आवश्यक कदम उठाने पड़ेंगे।
पासवान का कहना है कि कारपोरेट जगत तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में तो दलितों को आरक्षण दे ही सकते हैं। पासवान इस दलील को मानने को तैयार नहीं हैं कि आरक्षण से मेरिट की उपेक्षा होगी। वह कहते है कि आज दलित आईएएस अपनी मेरिट से टॉपर बन सकते हैं तो उनकी क्षमता को उनकी जाति से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें सदियों से मौका नहीं मिला है, लोकतंत्र में उन्हें भी मौका मिलना चाहिए।