वित्तमंत्री ने मुकदमों का बोझ खत्म करने व करदाताओं को दिक्कतों से निजात दिलाने के लिए बड़ी घोषणा की है। सीतारमण ने कहा, पिछले बजट में अप्रत्यक्ष कर के लिए सबका विश्वास योजना आई थी। इस बार प्रत्यक्ष कर के लिए विवाद से विश्वास योजना शुरू होगी।
आयकर प्रणाली मजबूत बनाने व रिटर्न प्रक्रिया सरल करने के लिए करदाताओं का चार्टर बनेगा। इसके लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को कानून में बदलाव का निर्देश दिया गया है। इसके जरिये करदाता और प्रशासन के बीच भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी व करदाताओं का अधिकार स्पष्ट होगा।
सरकार ने ऐसे प्रावधान किए हैं जिससे आयकर बचत के नाम पर पर धर्मार्थ संस्थाओं को दान देने का फर्जी खेल बंद हो जाएगा। इसके तहत अस्पताल और धर्मार्थ ट्रस्टों को हर पांच साल में नवीनीकरण कराना होगा। हर साल दानदाताओं की सूची अनिवार्यतः देनी होगी। ऐसा न करने पर दंड लगेगा। विदेश से धन लेने वाली संस्थाएं अगर हर पांच साल में गृह मंत्रालय से नवीनीकरण नहीं कराएंगी तो उन पर गाज गिरेगी। संस्थाओं को विशिष्ट पंजीकरण संख्या मिलने से दान देने वाले करदाताओं के लिए आईटीआर में छूट लेना आसान हो जाएगा।
सरकार ने दो टैक्स स्लैब का विकल्प देते समय वेतनभोगी और पेशेवर के लिए अलग-अलग प्रावधान किए हैं। नौकरीपेशा को जहां इसे चुनने का मौका हर साल दिया जाएगा, वहीं पेशेवर या कारोबारी को एक बार ही विकल्प चुनने का मौका मिलेगा। इसका मतलब है कि पेशेवर ने नए स्लैब का चुनाव कर लिया तो उसे वापस लौटने का मौका नहीं मिलेगा। वहीं, नौकरीपेशा हर साल बदलाव कर सकता है।
मध्यवर्ग पर भारी आयकर: बेरोजगारी, कमाई में कमी और बढ़ती महंगाई के बीच मध्यवर्ग के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारी आयकर की दरें थीं। लंबे समय से चली आ रही मांग के बावजूद 1997 के बाद आयकर दरों में कोई कटौती नहीं हुई थी। इससे लोगों के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे नहीं होते थे।
छोटी-छोटी गलतियों और तकनीकी कारणों से प्रत्यक्ष करों से जुड़े लाखों मामले विवाद में फंसे हैं। इसके चलते जहां आयकरदाता को परेशानी का सामना करना पड़ता है वहीं, सरकार का राजस्व भी फंसा रहता है। यह दोहरी मार थी।