कोरोना वायरस भले ही चीन में इंसानी जिंदगी के लिए खतरा बनकर आया हो, लेकिन यह भारतीय व्यापारियों और कारोबारियों को मेक इन इंडिया सोच को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है। दरअसल, चीन से बहुत सारे उत्पादों के आयात पर अचानक रोक लगने के बाद घरेलू कंपनियों ने अपने उत्पादों का उत्पादन बढ़ा दिया है।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण मेडिकल के क्षेत्र में सामने आया है। अभी तक चीन से आने वाले सर्जिकल मास्क, ग्लब्स समेत दर्जनों उत्पादों की खपत ज्यादा थी, लेकिन चीन से जब माल आ ही नहीं पा रहा है तो स्थानीय कंपनियों ने खुद ही इनका उत्पादन बढ़ा दिया।
उत्तर प्रदेश केमिस्ट डिस्ट्रीब्यूटर एसोसिएशन के महामंत्री राजेंद्र सैनी बताते हैं कि कोरोना संकट से निपटने के लिए चीन भले ही तमाम उपाय कर रहा हो, लेकिन यह कोई कर्फ्यू नहीं है जो दो, चार, दस दिन में हालात सामान्य हो जाएंगे। चीन को इस संकट से निजात पाने में वक्त लगेगा। यह बात स्थानीय कंपनियां समझ चुकी हैं और उन्होंने कई सारी चीजों का उत्पादन शुरू कर दिया है। यह स्वदेशी कंपनियों के लिए खुद को साबित करने का बेहतर समय है।
देशी कंपनियों की बल्ले-बल्ले
चीन से आयातित प्लास्टिक के घरेलू आइटम, पिचकारी, खिलौने आदि के कारोबारी अरुण कुमार गर्ग बताते हैं कि होली नजदीक है और चाइनीज पिचकारी की कुछ खेप फंस गई हैं। हालांकि काफी माल पहले ही आ चुका है, चूंकि माल की आपूर्ति लगातार होती रहती है इस वजह से आखिरी खेप का आयात प्रभावित हुआ है। अब बाजार में मांग और आपूर्ति का गैप स्वदेशी कंपनियों के उत्पादों से भरा जाएगा। पिचकारी बनाने वाली तमाम स्वदेशी कंपनियों ने उत्पादन बढ़ा दिया है। तमाम आयातकों ने दीपावली में आने वाले उत्पादों के आर्डर में कटौती कर दी है।
दूसरे देश से मंगाएं या स्वयं बनाएं, बात बराबर
केमिकल कारोबारी राजेंद्र अग्रवाल बताते हैं कि चीन से दर्जनों तरह का केमिकल आयात होता है। सबसे बड़ी जरूरत तो टेनरी संचालकों को ही है। चीन से आए केमिकल से ही चमड़े का शोधन होता है। केमिकल कारोबारियों के पास अधिकतम एक, डेढ़ महीने तक का स्टॉक है।
यदि हालात नहीं सुधरे तो टेनरियों को केमिकल मिलना बंद हो जाएगा। अन्य देशों से मंगाने पर कीमत में 20 से 25 फीसदी का इजाफा होगा। इतना ही मार्जिन स्वदेशी कंपनियों के उत्पादन में आता है। दरअसल स्वदेश में जो केमिकल 10 रुपये में बन सकता है वही चीन से मंगाने पर आठ रुपये में पड़ता है।
इस वजह से स्वदेश में उत्पादकता को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है। अब यह ऐसा दौर है जब चीन से आयात पूरी तरह ठप है, ऐसे में स्वदेशी कंपनियां महंगे उत्पादन का रिस्क ले सकती हैं। मगर चीन की कंपनियां फिर से शुरू होने के बाद सरकार की जिम्मेदारी बनती है वो आयात नियंत्रित करे।