आधार वर्ष बदलने पर विवाद क्यों
पिछले साल सरकार ने जीडीपी में गणना के तरीके में कुछ बदलाव कर दिया था, जिसको लेकर विवाद हो गया था। असल में सरकार ने कहा था, बेस ईयर बदलने के बाद उसके पिछले वर्षों में जारी जीडीपी आंकड़ों में भी बदलाव किए जाने चाहिए।
सरकार ने उचित तुलना के लिए इस आधार पर बैक सीरीज जारी किए थे और इसकी वजह से वित्त वर्ष 2006 से 2012 के बीच के जीडीपी आंकड़ों में कटौती कर दी गई थी जबकि वे मनमोहन सिंह सरकार के ऊंचे जीडीपी वाले साल थे। यूपीए सरकार के छह साल (वित्त वर्ष 2006 से 2012) के दौरान औसत जीडीपी बढ़त 7.75 फीसदी से घटाकर 6.82 फीसदी कर दी गई, इसे लेकर सरकार को विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ा था।
इसके पहले साल 2015 में सरकार ने जीडीपी की गणना के तरीके में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी किए थे। इसके पहले तक जीडीपी को नापने के लिए कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र को जगह दी जाती थी। इसके तहत कृषि क्षेत्र में पशुपालन, मछली पालन, बागवानी और अन्य कई सेक्टरों को जोड़ दिया गया, जिससे कृषि क्षेत्र में उत्पादन का आंकड़ा बढ़ गया। ठीक इसी तरह से उत्पादन क्षेत्र में पहले टीवी और स्मार्टफोन से आने वाले पैसे को जगह नहीं दी जाती थी। 2015 में हुए बदलाव में इन सेक्टरों को भी शामिल किया गया है। इसे लेकर भी आलोचकों ने कहा कि सरकार किसी भी तरह से जीडीपी के आंकड़े बढ़ा- चढ़ाकर दिखाने की कोशि?श कर रही है।
आधार वर्ष में तब्दील हमेशा महत्वपूर्ण होती है। अगर इसमें बदलाव नहीं हो तो अर्थव्यवस्था में होने वाला आधारभूत बदलाव पकड़ में नहीं आता। लेकिन 2017-18 का आधार वर्ष के लिए चयन सही नहीं है क्योंकि इस दौरान देश में नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का असर देखने को मिला था। - प्रणब सेन, पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद
54.3 फीसदी योगदान सर्विस क्षेत्र का रहा भारतीय जीडीपी में 2018-19 में, जो कि सबसे ज्यादा है।