चीन और अमेरिका का व्यापार युद्ध
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चीन और अमेरिका का व्यापार युद्ध
वाशिंगटन और बीजिंग के बीच जारी व्यापार युद्ध में ड्रैगन रेयर अर्थ मैटेरियल्स पर अपनी बढ़त का फायदा उठा रहा है। इन धातुओं पर चीन ने हालिया प्रतिबंध ऐसे समय में लगाए हैं जब शी और ट्रंप इस महीने के अंत में दक्षिण कोरिया में होने वाले एपीईसी शिखर सम्मेलन में मिलने वाले हैं। अपने सबसे हालिया कदम में, चीन ने पांच दुर्लभ रेयर अर्थ मैटेरियल्स- होल्मियम, एर्बियम, थुलियम, यूरोपियम, यटरबियम, और संबंधित चुम्बक व पदार्थ- को अपनी मौजूदा नियंत्रण सूची में शामिल कर लिया है। अब इनके निर्यात के लिए लाइसेंस की जरूरत होगी। चीन के इस कदम से प्रतिबंधित रेयर अर्थ एलिमेंट्स की कुल संख्या 12 हो गई है। चीन से देश के बाहर दुर्लभ मृदा निर्माण तकनीकों के निर्यात के लिए भी अब लाइसेंस जरूरी होगा।
रेयर अर्थ पर चीन के नियंत्रण और अमेरिका से तनातनी की कहानी
वर्ष 2005 के आसपास, चीन सरकार ने दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के निर्यात पर टैक्स बढ़ा दिए, जिससे पश्चिमी मैग्नेट निर्माताओं के लिए उत्पाद बनाना महंगा हो गया।चीन के बाहर लगभग कोई भी रेयर अर्थ खदान न होने के कारण, मोटर-पार्ट्स निर्माता और अन्य कंपनियां सस्ते कच्चे माल तक पहुंचने के लिए अपने फैक्ट्रियों को पश्चिम से चीन स्थानांतरित करने लगीं।
पश्चिम में उत्पादन इतना सीमित हो गया कि अमेरिकी कंपनी Molycorp ने माउंटेन पास खदान को पुनर्जीवित कर अपनी मैग्नेट बनाने की योजना बनाई। इसे Project Phoenix नाम दिया गया, लेकिन यह योजना असफल रही।
2012 में, ओबामा प्रशासन ने यूरोपीय संघ और जापान के साथ मिलकर विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चीन के खिलाफ मुकदमा दायर किया, आरोप लगाया कि चीन ने निर्यात कोटा का गलत तरीके से उपयोग कर दुर्लभ पृथ्वी आपूर्ति को नियंत्रित किया। चीन ने कहा कि यह प्रतिबंध खनन को टिकाऊ बनाने और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए थे। 2014 में, WTO ने चीन के खिलाफ फैसला सुनाया और कहा कि उसका निर्यात कोटा अनुचित था। इसके बाद चीन ने कोटा समाप्त कर दिए और अमेरिका को निर्यात में तेजी आई।
अमेरिका चीन का मुकबाला करने के लिए रास्ते तलाश रहा
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और अन्य रणनीतिक खनिजों की आपूर्ति बढ़ाने के उद्देश्य से हाल ही में एक समझौता किया है। यह कदम अमेरिका की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत चीन के बाजार पर वर्चस्व का मुकाबला करने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच समझौता
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी एल्बेनेस ने कहा कि यह समझौता 8.5 अरब डॉलर के तैयार हुए परियोजनाओं के पाइपलाइन को सहारा देगा, जिससे देश की खनन और परिशोधन क्षमता बढ़ेगी।
भारत का राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन
भारत अब खुद को आरईई मूल्य शृंखला में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (2025) के तहत, देश KABIL (खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड) जैसी पहलों और अमेरिका के नेतृत्व वाली खनिज सुरक्षा साझेदारी में अपनी भागीदारी के माध्यम से घरेलू एक्सप्लोरेशन, प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दे रहा है। हाल ही में आईआईएल (इंडिया) लिमिटेड को अमेरिकी निर्यात नियंत्रण सूची से हटााय जाना और विशाखापत्तनम में इसेक नए समैरियम-कोबाल्ट मैग्नेट प्लांट का चालू होना बड़ी उपलब्धि है।
15 से 20 वर्षों में 700 प्रतिशत तक बढ़ सकती है रेयर अर्थ की मांग
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि 2040 तक वैश्विक आरईई की मांग 300-700 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। नए उत्पादों के बाजार में प्रवेश करने के साथ चीन की हिस्सेदारी घटने की उम्मीद है। लेकिन विविधीकरण महंगा और समय लेने वाला है।