सरकार को किसानों की आय बढ़ाने पर ध्यान देना होगा और मनरेगा में 45 दिन के काम को बढ़ाकर कम से कम 100 दिन सुनिश्चित करना होगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल आएगा। मनरेगा का बजट मौजूदा 70 हजार करोड़ से बढ़ाकर सवा लाख करोड़ करना होगा।
जेएलएल इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री सामंतक दास कहते हैं कि उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में कमी मुख्य समस्या है। इसका मुकाबला करने के लिए सरकार को करों में छूट देनी होगी और वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा उठाते हुए भी सरकारी खर्च में इजाफा करना होगा। इसी कदम से खपत को बढ़ाया जा सकता है जिससे बाजार में पैसा आएगा। सरकार को इस बजट के जरिये कम से कम 3 साल का रोडमैप बनाना होगा। मौजूदा समय आर्थिक जोखिमों से भरा हुआ है। पिछले कुछ साल में असंगठित क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ और इसे राहत पहुंचाने से ही अर्थव्यवस्था जोर पकड़ेगी।
आर्थिक सुस्ती को देखते हुए इस बार बजट में आयकर दरों में कटौती की उम्मीद नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे उपाय जरूर किए जा सकते हैं जिनसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बढ़े और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल सके। लोगों की आय बढ़ेगी तो वे बाजार में खर्च भी करेंगे, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की मांग और उत्पादन बढ़ेगा। इसके अलावा सरकार को अपनी आय बढ़ाने के दूसरे तरीके भी अपनाने होंगे। इसमें उपहार कर (गिफ्ट टैक्स) और समृद्धि कर (वेल्थ टैक्स) शामिल है। महज एक फीसदी समृद्धि कर लगाने से ही सरकार को तीन लाख करोड़ रुपये मिल सकते हैं। साथ ही उसे विनिवेश और सरकारी भूमि को बेचने से भी अच्छी-खासी आय हो सकती है।