जलवायु परिवर्तन के नाम पर एकरतफा कार्रवाई "भेदभावपूर्ण हैं, बहुपक्षीय सहयोग को नुकसान पहुंचाते हैं" और ये संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। भारत ने शुक्रवार को यह बात कही। बाकू में आयोजित सीओपी29 में 'एकतरफा उपायों' पर अध्यक्षीय परामर्श में हस्तक्षेप करते हुए भारत ने कहा कि यह वैश्विक चिंता का विषय है, जिस पर तत्काल विचार करने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विकासशील देशों के विकास के मार्ग बाधित न हों।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में 130 से अधिक देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे बड़े समूह जी-77 तथा समान विचारधारा वाले विकासशील देशों सहित विकासशील देशों के अन्य समूहों ने भी इस मुद्दे पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। हालांकि, विकसित देशों, विशेष रूप से यूरोपीय संघ ने तर्क दिया कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए सही मंच नहीं है, क्योंकि इस मुद्दे पर विश्व व्यापार संगठन पहले ही विचार कर रहा है।
भारत ने कहा कि प्रतिबंधात्मक एकतरफा उपायों से विकासशील और निम्न आय वाले देशों को निम्न कार्बन अर्थव्यवस्थाओं में परिवर्तन की लागत वहन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे विकसित देशों की जलवायु वित्त प्रतिबद्धताएं कमजोर होती हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से औद्योगीकरण से लाभ मिला है और जिन्होंने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सबसे अधिक योगदान दिया है। भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से बचाव की कार्रवाई के नाम पर कोई भी एकतरफा उपाय विकासशील देशों के प्रति भेदभावपूर्ण और बहुपक्षीय सहयोग के लिए हानिकारक है। वे समानता के सिद्धांतों और सीबीडीआर-आरसी और यूएनएफसीसीसी प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।"
भारत ने आगे कहा कि एकतरफा व्यापार उपाय निर्यात की लागत बढ़ाकर निर्यात आधारित विकास के माध्यम से औद्योगीकरण करने के इच्छुक देशों के खिलाफ भेदभाव करते हैं। इसमें कहा गया है कि यदि लक्ष्य वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को कम करना है, तो जलवायु नीतियों को रियायती वित्त की पेशकश करने और शमन व अनुकूलन दोनों को संबोधित करने के लिए देशों की क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित व्यापार उपायों का सतत विकास और गरीबी उन्मूलन के प्रयासों के संदर्भ में समतापूर्ण और न्यायसंगत बदलावों पर उनके संभावित प्रभाव के लिए मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि किसी भी व्यापार-संबंधी जलवायु नीति को न्यायसंगत और उचित परिवर्तन, सतत विकास और गरीबी उन्मूलन पर इसके प्रभाव पर विचार करना चाहिए।
सोमवार को COP29 के प्रारंभिक पूर्ण अधिवेशन में काफी देरी हुई, क्योंकि विकसित और विकासशील देश इस बात पर बहस कर रहे थे कि यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे "एकतरफा व्यापार उपायों" को एजेंडा में शामिल किया जाए या नहीं। चीन ने BASIC समूह के देशों की ओर से पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र जलवायु निकाय के समक्ष एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसमें अनुरोध किया गया था कि इस वर्ष के COP में एकतरफा व्यापार उपायों के मुद्दे पर ध्यान दिया जाए।
सीबीएएम यूरोपीय संघ द्वारा भारत और चीन जैसे देशों से आयातित ऊर्जा-गहन उत्पादों, जैसे लोहा, इस्पात, सीमेंट, उर्वरक और एल्युमीनियम पर प्रस्तावित कर है। यह कर इन वस्तुओं के उत्पादन के दौरान उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन पर आधारित है। यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों ही इस तंत्र के अपने संस्करणों को लागू करने के विभिन्न चरणों में हैं।
यूरोपीय संघ ने पहले तर्क दिया था कि यह तंत्र घरेलू स्तर पर निर्मित वस्तुओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराता है, जिन्हें कठोर पर्यावरणीय मानकों का पालन करना होगा, तथा आयात से होने वाले उत्सर्जन को रोकने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले महीने सीबीएएम को "एकतरफा और मनमाना" करार दिया था और कहा था कि इस तरह के उपायों से भारत के उद्योगों को नुकसान पहुंच सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संतुलन बिगड़ सकता है।
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अनुसार, सीबीएएम भारत से यूरोपीय संघ को निर्यात किए जाने वाले कार्बन-गहन वस्तुओं पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत कर लगाएगा। यह कर भारत भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 0.05 प्रतिशत होगा।