Supreme Court: तमिलनाडु और केरल के लगभग 100 धर्मप्रांतों और मंडलियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर शीर्ष अदालत में अपील दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि ननों और पादरियों की आय उस मंडली की आय बन जाती है जो स्कूल को चलाती है और ये शिक्षक व्यक्तिगत रूप से वेतन के रूप में भुगतान की गई राशि प्राप्त नहीं करते हैं।
उच्चतम न्यायालय एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है। सरकारी सहायता प्राप्त ईसाई मिशनरी स्कूलों में शिक्षक के तौर पर काम करने वाली नन और पादरी आयकर छूट के हकदार हैं या नहीं, इस पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सहमति दे दी है।
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प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने गुरुवार को वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार के इस कथन पर संज्ञान लिया है कि इस मुद्दे पर तमिलनाडु और केरल के कई धर्मप्रांतों और मंडलियों की याचिका पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है।
पीठ उस याचिका को सूचीबद्ध करने पर विचार करने पर सहमत हो गई, जिसमें यह मुद्दा उठाया गया था कि क्या शिक्षकों के रूप में काम करने वाली नन और पादरियों की आय पर आयकर लगाया जा सकता है। दिसंबर 2014 में आयकर विभाग ने शिक्षा अधिकारियों से शिक्षकों के तौर पर काम कर रहे लोगों के आय के स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) लगाने को कहा था।
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तमिलनाडु और केरल के लगभग 100 धर्मप्रांतों और मंडलियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर उच्च न्यायालयों के सहमत नहीं होने के बाद शीर्ष अदालत में अपील दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि ननों और पादरियों की आय उस मंडली की आय बन जाती है जो स्कूल को चलाती है और ये शिक्षक व्यक्तिगत रूप से वेतन के रूप में भुगतान की गई राशि प्राप्त नहीं करते हैं।
मद्रास और केरल के उच्च न्यायालयों ने आयकर छूट की याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाओं में कहा गया है कि सरकारी सहायता प्राप्त मिशनरी स्कूलों को 1944 से तब तक आईटी छूट मिलती रही जब तक केंद्र सरकार ने 2014 में आय स्रोत पर कर कटौती लागू करने का फैसला नहीं किया।