जुलाई-सितंबर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घटकर 5.4 प्रतिशत रहने के बावजूद, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) इस सप्ताह अपनी समीक्षा बैठक के दौरान मौजूदा रेपो दर को बरकरार रख सकता है। मई 2022 से, आरबीआई ने फरवरी 2023 तक रेपो दर को 250 बीपीएस बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत किया था, उसके बाद पिछली एमपीसी बैठक तक इसे स्थिर रखा गया है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में एमपीसी की अगली बैठक 4 से 6 दिसंबर 2024 के बीच होनी वाली है। इसमें लिए गए फैसलों की जानकारी दास 6 दिसंबर को देंगे। महंगाई के आंकड़े सार्वजनिक होने से पहले बड़े पैमाने पर विशेषज्ञ अनुमान जता रहे थे कि अगली एमपीसी बैठक में बेंचमार्क दरों को कम किया जा सकता है। हालांकि, खुदरा महंगाई दर का आंकड़ा 6% से अधिक होने के कारण उनकी राय बदली है। इस बार एमपीसी की ओर से ब्याज दरों में कटौती का फैसला लेने की गुंजाइश न के बराबर है। शुक्रवार (29 नवंबर) को प्रकाशित नवीनतम जीडीपी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025 की दूसरी तिमाही में वृद्धि दर साल-दर-साल आधार पर धीमी होकर 5.4 प्रतिशत हो गई, जो पहली तिमाही में 6.7 प्रतिशत थी।
जानकार मानते हैं कि आरबीआई चालू वित्तीय वर्ष के लिए अपने विकास और मुद्रास्फीति अनुमानों में संशोधन कर सकता है। उनके अनुसार केंद्रीय बैंक अपने विकास अनुमान को मौजूदा 7.2 प्रतिशत से कम कर सकता है और अपने मुद्रास्फीति पूर्वानुमान को बढ़ा सकता है, जो वर्तमान में 4.5 प्रतिशत है। हालांकि आधारभूत दरों में कटौती की संभावना फिलहाल नहीं है। हालांकि, एमपीसी की इस महीने होने वाली समीक्षा में मुख्य रूप से तरलता प्रबंधन पर ध्यान दिए जाने की उम्मीद है।
भारत के निजी क्षेत्र के सबसे बड़े ऋणदाता एचडीएफसी बैंक की एक रिपोर्ट में इस धारणा को दोहराया गया है कि केंद्रीय बैंक इस कैलेंडर वर्ष की अपनी अंतिम एमपीसी बैठक में रेपो दर को 6.5 प्रतिशत पर बनाए रखेगा। एचडीएफसी बैंक के विश्लेषण ने वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही के दौरान ग्रामीण मांग में संभावित उछाल को की बात कही है, इसके प्रमुख कारण सरकारी योजनाओं का वितरण और बढ़ा हुआ सार्वजनिक खर्च है। ये कारक सामूहिक रूप से आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा दे सकते हैं।
रॉयटर्स के एक सर्वेक्षण से भी संकेत मिलता है कि एमपीसी 6 दिसंबर की बैठक के दौरान रेपो दर को वर्तमान स्तर पर ही बरकरार रख सकता है। सर्वेक्षण के अनुसार, बढ़ती महंगाई ने कई अर्थशास्त्रियों को फरवरी तक ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को स्थगित करने के लिए प्रेरित किया है। खुदरा मुद्रास्फीति ने अक्तूबर में आरबीआई की 6 प्रतिशत की सहनशीलता सीमा को पार कर लिया, जिसका मुख्य कारण खाने-पीने के चीजों की कीमतों में उछाल था।