पिछली एमपीसी बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर।
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लिक्विडिटी में धीरे-धीरे बदलाव की उम्मीद
एसबीआई में ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष कहते हैं, आरबीआई बाजार की स्थिति को देखते हुए लिक्विडिटी में धीरे-धीरे बदलाव कर सकता है। केंद्रीय बैंक के पास यह सुविधा है कि वह परिस्थितियों के अनुसार कैश की उपलब्ध्ता को सुरक्षित करें।
महंगाई पर रहेगी नजर
जियोजित इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के रिसर्च हेड विनोद नायर कहते हैं, अगला हफ्ता घरेलू मोर्चे पर बड़ा होगा। क्योंकि आरबीआई की एमपीसी की बैठक सबसे महत्वपूर्ण होगी, जबकि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होने की लगभग पूरी संभावना है या कहें रेट पॉज पर सहमति है। केंद्रीय बैंक कच्चे तेल से होने वाली महंगाई के रिस्क और चार साल के सबसे निचले विनिर्माण पीएमआई के बीच संतुलन बना रहा है, जो विकास की गति में नरमी के संकेत दे रहा है। नायर बताते हैं, दर चक्र की दिशा और वित्त वर्ष 2027 के अनुमान पर गवर्नर की टिप्पणी क्या होती है इस पर नजर रखनी होगी।
जानकारों का कहना है, वैश्विक स्तर पर देखें तो मार्च में जारी होने वाले अमेरिकी सीपीआई के आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं। उम्मीद से अधिक सकरात्मक रुझान फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद पर पानी फेर सकते हैं और डॉलर को मजबूती प्रदान कर सकते हैं। इससे भारत सहित उभरते बाजारों के लिए वित्तीय स्थिति को और भी कठिन बन सकती है। जानकार कहते हैं कि आरबीआई को रुपये की कमजोरी को देखकर जल्दबाजी में ब्याज दरों में बदलाव नहीं करना चाहिए। ब्याज दरों का उद्देश्य एक्सचेंज पर रेट को संभालना नहीं बल्कि महंगाई को न बढ़ने देना होना चाहिए।
पश्चिम एशिया संकट के कारण आरबीआई की राह कठिन
केयरएज रिेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से आरबीआई एमपीसी की बैठक की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। हमें उम्मीद है कि आरबीआई ब्याज दरों और अपने रुख को एक जैसा बनाए रखेगा, साथ ही बदलते भू-राजनीतिक हालात पर नजर रखेगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए आरबीआई की विकास की गति और महंगाई के आउटलुकर के लिए आने वाली पॉलिसी पर करीब से नजर रखी जाएगी, विशेषकर वैश्विक स्तर पर बढ़े हुए जोखिमों पर।
रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 में रिटेल महंगाई दर 2.74 प्रतिशत थी, जो फरवरी 2026 में बढ़कर 3.21 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि महंगाई दर आरबीआई के 4 प्रतिशत के मध्य अवधि के लक्ष्य के दायरे में बनी हुई है, लेकिन कच्चे तेल कीमतों में उछाल महंगाई बढ़ने का अनुमान है, जहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तर से असर पड़ेगा। कच्चे तेल बढ़ती कीमतों से ईंधन व एलपीजी तथा परिवहन खर्च भी बढ़ जाता है। इससे सभी सेक्टरर्स की इनपुट लगात भी बढ़ जाती है। भले ही सरकार की ओर से आपूर्ति सुरक्षित है, लेकिन आपूर्ति में रुकावटों ने महंगाई बढ़ाने का खतरा बढ़ा दिया है। इसलिए एमपीसी इस बात का आंकलन करेगी कि दबाव कुछ समय के लिए है या फिर लंबे समय तक पड़ेगा।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यदि वर्ष वित्त 2027 में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें औसत 90 अमेरिकी डॉलर प्रति आंकड़े पर रहती हैं, तो हमें भारत की वृद्धि दर में गिरावट की उम्मीद है और यह दर 6.7% होगी। वित्तीय वर्ष 2027 के आधारभूत अनुमान के अनुसार, उपभोक्ता पर वैश्विक कच्चे तेल की उच्च कीमतों के सीमित प्रभाव को मानते हुए, सीपीआई मुद्रास्फीति 4.5-4.7% के बीच रहने का अनुमान है। साथ ही वैश्विक अनिश्चितता, बढ़ते राजकोषीय बोझ और मुद्रास्फीति के दबाव के बीच जी-सेक यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव पड़ने की आशंका है।