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West Asia Crisis: आरबीआई गवर्नर ने चेताया, स्थिति न सुधरी तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी तय

Wed, 13 May 2026 09:12 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसकी आशंका जताई है। क्रूड की बढ़ती कीमतों और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके असर को समझाती यह रिपोर्ट पढ़ें।
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पेट्रोल डीजल की कीमतों बढ़ोतरी - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। ज्यूरिख में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और स्विस नेशनल बैंक की ओर से आयोजित 12वें उच्च-स्तरीय सम्मेलन में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एक अहम बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जो भारी उछाल आया है, उसका बोझ अब तक सरकार उठा रही है। लेकिन, अगर यह वैश्विक व्यवधान लंबे समय तक खिंचता है, तो आम उपभोक्ताओं को ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है।

सरकार पर बढ़ता दबाव और कीमतों में संभावित उछाल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद, भारत सरकार ने अब तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा है। इसके लिए सरकार ने अपनी तरफ से ड्यूटी कम करने और गैस जैसी कुछ नियंत्रित कीमतों में मामूली वृद्धि करने जैसे कदम उठाए हैं। आरबीआई गवर्नर के अनुसार, पिछले 75 दिनों से अधिक समय से जारी इस संकट के कारण मौजूदा स्थिति को अनिश्चित काल तक बनाए रखना संभव नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह केवल समय की बात है कि सरकार इन बढ़ी हुई कीमतों का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल देगी। हालांकि, उन्होंने इस बात की भी सराहना की कि महामारी के दौरान 9.2 प्रतिशत तक पहुंच चुके राजकोषीय घाटे को सरकार ने राजकोषीय विवेक का पालन करते हुए करीब 4.3 प्रतिशत तक सफलतापूर्वक कम कर लिया है।

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पश्चिम एशिया पर भारत की गहरी आर्थिक निर्भरता

पश्चिम एशिया का क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। आरबीआई गवर्नर ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत के कुल आयात और निर्यात का छठा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है। इसके अलावा, भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस (प्रवासियों की ओर से भेजी जाने वाली रकम) का 40 प्रतिशत, उर्वरक आयात का 40 प्रतिशत और गैस आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है। इस उच्च निर्भरता के कारण, मध्य पूर्व में किसी भी तरह का तनाव या भू-राजनीतिक अस्थिरता भारत की आपूर्ति शृंखला और अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर एक बड़ा जोखिम पैदा करती है। 

महंगाई का जोखिम और नीतिगत चुनौतियां

आपूर्ति शृंखला में आने वाले इन झटकों का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ता है। भारत के लिए यह जोखिम इसलिए भी अधिक है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) बास्केट में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 40 प्रतिशत है। गवर्नर ने यह स्वीकार किया कि आपूर्ति पक्ष के बड़े झटकों से निपटने के लिए केवल मौद्रिक नीति पर्याप्त नहीं हो सकती है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीति निर्माताओं को मजबूत और सतर्क रवैया अपनाना चाहिए। यदि आपूर्ति में व्यवधान का असर अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में फैलने लगता है और महंगाई व्यापक रूप लेने लगती है, तो नीति निर्माताओं को अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप करना होगा। 

आरबीआई गवर्नर का यह बयान इस बात का संकेत है कि वैश्विक संकटों से भारत पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। सरकार ने अब तक आम जनता को महंगाई की सीधी मार से बचाने का प्रयास किया है, लेकिन पश्चिम एशिया की अनिश्चितता लंबी खिंचने पर घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में वृद्धि एक अपरिहार्य कदम बन सकता है। ऐसे जटिल माहौल में, आरबीआई को घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपनी मौद्रिक नीति को बेहद लचीला और चुस्त बनाए रखने की आवश्यकता होगी।

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