क्या भारतीय शेयर बाजार अपने चरम पर पहुंच गया है? मौजूदा हालात में यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिन लोगों ने भारतीय बाजार की दिग्गज कंपनियों को खड़ा किया, वही अब अपनी हिस्सेदारी बेचने की होड़ में हैं। 2025 में भारतीय शेयर बाजार में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। इस साल भारतीय कंपनियों के प्रमोटरों ने बिकवाली के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए।
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस साल कंपनियों के प्रमोटर्स यानी मालिकों ने 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के शेयर बेच दिए हैं। यह लगातार तीसरा साल है जब बिकवाली का यह आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है, और इसने 2024 के 1.43 लाख करोड़ रुपये के पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है ।
आइए इस रिपोर्ट में, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर 'कंपनी के मालिक' अपना हिस्सा क्यों बेच रहे हैं, यह पैसा कहां जा रहा है, और क्या इससे आम निवेशकों को डरने की जरूरत है?
1. कंपनी मालिकों की बिकवाली के आंकड़े क्या कह रहे?
प्राइम डेटाबेस और कोटक सिक्योरिटीज जैसे संस्थानों के आंकड़ों के अनुसार, इस बिकवाली की दो मुख्य धाराएं हैं। पहली धारा है, सेकेंडरी मार्केट जिसके तहत ब्लॉक और बल्क डील्स आते हैं। इसके जरिए लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपये की हिस्सेदारी सीधे शेयर बाजार में ब्लॉक डील्स के जरिए बेची गई । बिकवाली की दूसरी धारा है प्राइमरी मार्केट। इसके तहत आईपीओ और ओएफएस आते हैं। आईपीओ के जरिए भी प्रमोटरों ने ऑफर फॉर सेल (OFS) का रास्ता अपनाकर 18,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए हैं।
भारत के कुछ सबसे प्रमुख व्यापारिक घरानों ने इस दौरान जमकर बिकवाली की है। भारती एयरटेल के प्रमोटर्स ने सबसे अधिक 44,682 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इसके बाद इंडिगो में 14,497 करोड़ रुपये, विशाल मेगामार्ट 10,220 करोड़ रुपये, एडब्ल्यूएल एग्री कमोडिटीज 11,064 करोड़ रुपये और एमफैसिस 4,726 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई। सैजिलिटी, बजाज फिनसर्व, कोहांस लाइफसाइंसेज, हिंदुस्तान जिंक, डिक्सन, एप्टस, केफिन टेक और बजाज हाउसिंग फाइनेंस में भी प्रमोटर्स की ओर से की गई बिक्री 1,000 करोड़ रुपये से अधिक है।
बाजार में हुई इस बिकवाली का नतीजा यह हुआ है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड कंपनियों में निजी प्रमोटरों की हिस्सेदारी जून 2025 तक गिरकर 40.58% रह गई है, जो पिछले 8 वर्षों का सबसे निचला स्तर है ।
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2. भारतीय कंपनियों के प्रमोटर्स अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रहे?
बाजार में एक पुरानी कहावत है- 'प्रमोटर्स नो बेस्ट' (प्रमोटर अपने बिजनेस को सबसे बेहतर समझते हैं)। अगर वे बेच रहे हैं, तो इसके कई रणनीतिक कारण हैं। ये क्या हैं, आइए इन्हें समझते हैं।
जेएम फाइनेंशियल के एक विश्लेषण के मुताबिक, बिकवाली का एक बड़ा हिस्सा स्मॉल-कैप कंपनियों में देखा गया है। जिन कंपनियों में प्रमोटरों ने हिस्सेदारी घटाई है, उनमें से 78% स्मॉल-कैप हैं । यह इशारा करता है कि प्रमोटरों को लगता है कि उनके शेयरों की कीमतें बहुत बढ़ चुकी हैं और मुनाफा कमाने का यह सही समय है।
कई प्रमोटर्स ने कंपनी का कर्ज चुकाने के लिए शेयर बेचने का रास्ता अपनाया है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण ओला इलेक्ट्रिक है, जहां संस्थापक भाविश अग्रवाल ने 324 करोड़ रुपये के शेयर बेचे ताकि वे अपना निजी कर्ज चुका सकें और गिरवी रखे शेयरों को छुड़ा सकें । बाजार ने इसे सकारात्मक तौर पर लिया और कंपनी के शेयरों में इससे मजबूती नजर आई।
- एमएनसी कंपनियों की ग्लोबल स्ट्रैटेजी
कई विदेशी कंपनियां यानी एमएनसी अपने मुख्यालयों का कर्ज कम करने के लिए भारतीय यूनिट्स का उपयोग 'एटीएम' की तरह कर रही हैं। उदाहरण के लिए, वर्ल्हपूल कॉरपोरेशन ने अपनी भारतीय इकाई में हिस्सेदारी घटाकर 1,489 करोड़ रुपये जुटाए हैं। ।
भारती एयरटेल में प्रमोटर परिवार और सिंगटेल ने पूंजी की रिसाइकलिंग का हवाला देकर हजारों करोड़ के शेयर बेचे, लेकिन कंपनी के मजबूत प्रदर्शन के कारण स्टॉक प्राइस पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। वहीं, इंडिगो में राकेश गंगवाल का एग्जिट एक लंबे समय से चल रहे विवाद के समाधान के लिए था।