उजाला सिग्नस हॉस्पिटल के संस्थापक निदेशक डॉ शुचिन बजाज और कॉलेज देखो के सीईओ और सह-संस्थापक रुचिर अरोड़ा सोमवार को गुरुग्राम में अमर उजाला संवाद के मंच पर दिखे। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। देश में मौजूद स्वास्थ्य सुविधाओं और उससे जुड़ी चुनौतियों पर बोलते हुए डॉ शुचिन बजाज ने कहा कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को इस तरह से विकासित किया जाना चाहिए ताकि पैसे की कमी के कारण कभी किसी को इलाज से वंचित न रहना पड़े। उजाला सिग्नस हॉस्पिटल अपनी सेवाओं से इसी मुहिम को आगे बढ़ा रहा है।
अमर उजाला संवाद में बोलते हुए डॉ शुचिन बजाज ने सरकार की ओर से चलाए जा रहे आयुष्माण भारत की तारीफ करते हुए कहा कि इस योजना से बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को लाभ पहुंचा है। पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में और बहुत काम किए जाने की जरूरत है। हाल में हुए पीजी नीट विवाद पर अपना मत साझा करते हुए डॉ बजाज ने कहा कि जिस परीक्षा से डॉक्टरों की बुनियाद रखी जा रही है, वह निष्पक्ष होनी चाहिए। सरकार को इसके लिए सख्त कदम उठाने चाहिए ताकि परीक्षाएं न सिर्फ निष्पक्ष तरीके से हों, बल्कि निष्पक्ष होती दिखाई भी दें।
डॉ बजाज ने कहा कि इलाज पर खर्च के कारण हर साल देश में करीब 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। अगर कोई अस्पताल में भर्ती होता है तो, उसके परिजनों को अस्पताल का बिल चुकाने के लिए अपनी संपत्ति में से कुछ ना कुछ बेचना पड़ता है। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों का बजट निजी अस्पतालों की तुलना में काफी ज्यादा है, पर वहां डॉक्टरों की कमी है। जिससे आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को समुचित इलाज नहीं मिल पाता है। सरकारी अस्पताल में ट्रेनिंग पूरी करके डॉक्टर निजी अस्पतालों का रुख कर लेते हैं। इस स्थिति को बदले जाने की जरूरत है। डॉ बजाज ने कहा कि केवल बड़े-बड़े भवन और मशीनरी के भरोसे लोगों का इलाज नहीं किया जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए अनुभवी डॉक्टरों की जरूरत है, जिससे छोटो शहरों और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पर्याप्त इलाज मिल सके।
कॉलेज देखो के सह संस्थापक और सीईओ रुचिर अरोड़ा ने कहा कि बुनियादी दिक्कत यह है कि जिसे लेखक बनना है, वह इंजीनयर बन रहा है। फिर वह अच्छे संस्थान में भी नहीं पढ़ पा रहे। हमने सोचा कि क्यों न बच्चों की अच्छे पाठ्यक्रम में मदद करें। हम युवाओं के बीच बेरोजगारी की दिक्कत को दूर करने की दिशा में प्रयासरत हैं।