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एक एग्जिट पोल पर आता है तीन से पांच करोड़ का खर्च, ये है पूरी प्रक्रिया

Sun, 19 May 2019 05:08 PM IST
paliwal पालीवाल बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : अमर उजाला
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आज शाम को एग्जिट पोल के नतीजे आएंगे। लोगों में मतगणना से पहले इन नतीजों की बहुत उत्सुकता रहती है। हालांकि इन एग्जिट पोल को कराने में भी बहुत खर्चा होता है। हालांकि यह खर्च इतना ज्यादा होता है कि एक एजेंसी या फिर मीडिया हाउस इसका पूरा खर्च अपने आप वहन नहीं कर सकते हैं। आपको बताते हैं कि कैसे एग्जिट पोल का प्रोसेस होता और इस पर कितना खर्च आता है। 
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प्रत्येक एग्जिट पोल पर तीन करोड़ का खर्च

एग्जिट पोल पर खर्च सीधे-सीधे सैंपल साइज पर निर्भर होता है। जितना बड़ा सैंपल साइज होगा, उतना ही खर्च बढ़ जाएगा। एग्जिट पोल को कराने वाली एजेंसियों के मुताबिक अगर सैंपल साइज 60 हजार लोगों का है तो फिर इस पर तीन करोड़ का खर्च आएगा।
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वहीं एक लाख के सैंपल साइज पर पांच करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। एक सैंपल साइज पर करीब पांच सौ रुपये आता है। कर्मचारियों को केवल प्रोजेक्ट के बेसिस पर रखा जाता है। कोई भी कंपनी इनको मासिक वेतन पर नहीं रखती है। 

बड़े से लेकर के छोटे मीडिया हाउस भी करते हैं शेयर

अक्सर आपने देखा होगा कि एक एजेंसी का एग्जिट पोल अलग-अलग चैनलों या फिर अखबार में दिखाई देता है। ऐसा असलिए क्योंकि इसका खर्च एक कंपनी वहन नहीं कर सकती है। इसलिए कई छोटे चैनल भी भी बड़े चैनलों और सर्वे एजेंसियों के साथ हाथ मिलाकर के इस डाटा को अपने यहां चलाते हैं। 

इस बार आठ बड़े चैनलों पर होगा प्रसारित

अबकी बार का एग्जिट पोल आठ बड़े चैनलों पर प्रसारित होगा। इन चैनलों ने करीब नौ एजेंसियों के साथ टाईअप किया है। यह चैनल और एजेंसियां हैं न्यूज 18-IPSOS, इंडिया टुडे-एक्सिस, टाइम्स नाऊ-वीएमआर, न्यूज एक्स-नेता, रिपब्लिक-जन की बात, रिपब्लिक-सी वोटर, एबीपी-नीलसन, इंडिया टीवी-सीएनएक्स और न्यूज24-टुडे चाणक्य। 
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एग्जिट पोल - फोटो : Amar Ujala

कैसे होता एग्जिट पोल?

एग्जिट पोल हमेशा मतदान वाले दिन ही होता है। बूथ पर वोट डालने के बाद मतदाता जब बाहर निकलता है, तो उससे कुछ सवाल पूछे जाते हैं और मतदाता के मिजाज को टटोलने की कोशिश की जाती है। जिससे ये पता लग सके कि वोटर किस दल को या किस प्रत्याशी को अपना कीमती वोट देकर आ रहा है।

वोटिंग के दिन जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण कर चुनाव के आखिरी दिन शाम को एग्जिट पोल दिखाया जाता है। लेकिन जब मतदान कई चरणों में हो, जैसा कि लोकसभा चुनाव में होता है, तो आखिरी दौर के बाद ही एग्जिट पोल दिखाए जा सकते हैं।

हर बार सही नहीं साबित होता है एग्जिट पोल

आंकड़ों और कयासों के योग से किसी एक पार्टी के जीत की भविष्यवाणी कर दी जाएगी और ग्रहदशा की गणना करके किसी पार्टी का सूपड़ा साफ कर दिया जाएगा। कई बार एग्जिट पोल गलत भी साबित हुए हैं। ऐसे में इन पर पूरी तरह से यकीन करना सही नहीं होता है। 

जिसकी एक मुख्य वजह है, वोटिंग के दिन इकट्ठा किया जाने वाला डाटा। मतदान के दिन जब कोई एक वोटर से बात कर रहा होता है, उस बीच कई वोटरों की राय शामिल नहीं हो पाती है। जिसकी वजह से कई बार एग्जिट पोल गलत साबित भी होते हैं।

कब शुरु हुआ एग्जिट पोल?

माना जाता है कि एग्जिट पोल की शुरुआत साल 1967 में हुई थी। नीदरलैंड के एक समाजशास्त्री और पूर्व राजनीतिज्ञ मार्सेल वान डेन अपने देश के चुनाव के दौरान एग्जिट पोल किया था। हालांकि ये भी कहा जाता है इसी साल अमेरिका में एक राज्य के चुनाव के दौरान पहली बार एग्जिट पोल किया गया था।
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