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Indian Economy Growth: आर्थिक मोर्चे पर ‘सुपर पॉवर’ बना देश! महंगाई-बेरोजगारी जैसे हर सवाल का मिला जवाब

अमित शर्मा
Updated Sat, 03 Sep 2022 04:33 PM IST

सार

Indian Economy Growth: भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आर्थिक मामलों के जानकार जफर इस्लाम ने कहा कि प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का जो सपना देखा था, वह ठोस योजना पर आधारित था। इसका असर दिखाई पड़ रहा है और यह पूरी दुनिया के लिए उम्मीद पैदा करने वाला है...
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Indian Economy Growth - फोटो : pixabay


लेकिन बुधवार को जारी एनएसओ के आंकड़ों ने अचानक ही सरकार को फ्रंट फुट पर ला दिया है। इन आंकड़ों में 2022-23 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में अर्थव्यवस्था में 13.5 फीसदी की वृद्धि होने की बात कही गई है। यह वृद्धि इस मायने में बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इसी अवधि में अमेरिका-ब्रिटेन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं नकारात्मक वृद्धि (-0.6 फीसदी और -0.1 फीसदी क्रमशः) झेल रही हैं, तो इटली, जर्मनी, फ्रांस और स्पेन जैसे अनेक देश एक फीसदी से भी कम वृद्धि दर दर्ज कर रहे हैं। पड़ोसी चीन की ड्रैगन अर्थव्यवस्था भी केवल 0.4 फीसदी की वृद्धि हासिल कर सकी है। पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल की अर्थव्यवस्था बहुत खराब स्थिति में है।


भारत की तेज बढ़त अनुमानों के आसपास ही रही है। आईएमएफ वित्त वर्ष 2022-23 में भारत के 7.4 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़ने का अनुमान लगा रहा है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी पहली तिमाही में लगभग 16 फीसदी का अनुमान लगा रहा था। सरकार ने राजकोषीय घाटा भी लक्ष्य के अनुसार कम करने में सफलता हासिल की है।

जीएसटी संग्रह छह महीने से लगातार 1.4 लाख करोड़ रुपये के पार

अर्थव्यवस्था के कई संकेत देश की आर्थिक स्थिति के लगातार बेहतर होने का संकेत दे रहे हैं। जीएसटी संग्रह छह महीने से लगातार 1.4 लाख करोड़ रुपये के पार बना हुआ है। वाहनों की बिक्री में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। एफएमसीजी उत्पादों की बिक्री भी लगातार तेज बनी हुई है। सरकार के लिए चिंता का कारण बनी बेरोजगारी भी लगातार कमजोर पड़ रही है। अब यह गिरकर 7.6 फीसदी पर आ चुकी है, जो यह संकेत देता है कि निर्माण और मैनूफैक्चरिंग सेक्टर में लगातार सुधार हो रहा है। जिस समय पूरी दुनिया के देश रिकॉर्ड महंगाई की मार झेल रहे हैं, भारत में खुदरा महंगाई दर में कमी आ रही है। दाल, सब्जी, अनाज और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता बनी हुई है। पेट्रोल-डीजल कीमतों में स्थिरता भी महंगाई को कमजोर करने में सहायक हुई है।



अंतरराष्ट्रीय बाजार में शेयर मार्केट दबाव झेल रहे हैं। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा और भारतीय रुपया लगातार टूटता हुआ 80 रुपये प्रति डॉलर की मनोवैज्ञानिक सीमा को पार कर वापस आ चुका है। इसी बीच विदेशी निवेशकों ने तेजी से पैसा निकाला और बाजार बुरी तरह लड़खड़ाया। लेकिन जैसे ही अमेरिकी सेंट्रेल बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी शुरू की, विदेशी निवेशक एक बार फिर भारतीय बाजारों की ओर रूख कर रहे हैं और बाजार फिर उछाल पर है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशकों के लौटते भरोसे का प्रमाण है।

किन कारणों से सुधरी अर्थव्यवस्था

देश की अर्थव्यवस्था में यह मजबूती किन कारणों से दिख रही है? अमर उजाला के इस सवाल पर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आर्थिक मामलों के जानकार जफर इस्लाम ने कहा कि कोरोना की महामारी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को दबाव में ला दिया। इस दौरान अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने ज्यादा करेंसी छापकर लोगों को राहत पहुंचाने का काम किया। यह उपाय तात्कालिक राहत अवश्य पहुंचाता है, लेकिन लंबी अवधि में इससे मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी होती है। इस समय ये देश अपनी उसी गलती का परिणाम भुगत रहे हैं।



इसी कोरोना काल में भारत सरकार ने अपने 80 करोड़ नागरिकों को न केवल मुफ्त राशन पहुंचाया, बल्कि उनके लिए दवा और वैक्सीन की व्यवस्था भी की। इससे अर्थव्यवस्था पर भारी खर्च भी बढ़ा, लेकिन इस भारी खर्च के बाद भी सरकार ने कोई तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाला शॉर्ट कट नहीं अपनाया।


केंद्र सरकार ने इसी दौरान पीएलआई योजना लागू कर उद्योगों को राहत पहुंचाई, निर्यात पर सब्सिडी दी गई, घरेलू उत्पादकों को राहत पहुंचाई गई। कॉरपोरेट टैक्स में कमी कर निवेशकों के हाथों में ज्यादा पैसा छोड़ा गया, जिससे वे अलग-अलग योजनाओं में पैसा लगा सकें। मजदूरों के हाथ में पैसा पहुंचाकर उनकी खरीद क्षमता बनाए रखी गई। यही कारण है कि इन सकारात्मक कदमों का असर अब अर्थव्यवस्था पर दिखाई पड़ रहा है और देश मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है।


जफर इस्लाम ने कहा कि देश में आने वाले तीन महीने त्योहारों का सीजन रहने वाला है। इस दौरान व्यापार में तेजी रहती है, और उत्पादन में भी तेजी रहती है। लिहाजा माना जा सकता है कि आने वाले समय में भी अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहेगी और देश तेजी से आगे बढ़ेगा। दुनिया के सकल उत्पादन का लगभग एक चौथाई भारत में पैदा हो रहा है। प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का जो सपना देखा था, वह ठोस योजना पर आधारित था। इसका असर दिखाई पड़ रहा है और यह पूरी दुनिया के लिए उम्मीद पैदा करने वाला है।

लेकिन यहां हैं चिंता के कारण        

लेकिन ऐसा नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। कई ऐसे बिंदु हैं जहां सरकार के लिए परेशानी खड़ी करने वाले संकेत मिल रहे हैं। उदाहरण के लिए किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले कोर सेक्टर के आठ क्षेत्र (कोयला, तेल, गैस, संशोधित पेट्रो उत्पाद, बिजली, स्टील, उर्वरक) के उत्पादन में पिछले छह महीने से गिरावट दर्ज की जा रही है। इन सेक्टर में कमजोरी का सीधा अर्थ उत्पादन में कमी और रोजगार के अवसरों में कमी के रूप में सामने आता है। इस समय इस सेक्टर में कमी के बाद भी उत्पादन में कमी का संबंध असंगठित क्षेत्र के उत्पादन में कमी और संगठित क्षेत्र के उत्पादन में वृद्धि से हो सकता है।

असंगठित क्षेत्र की ओर ध्यान दे सरकार

अर्थव्यवस्था के जानकार प्रो. अरूण कुमार ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार जिन आंकड़ों के सहारे अपनी पीठ थपथपा रही है, वे आंकड़े संगठित (ऑर्गेनाइज्ड) सेक्टर के हैं। यह सही बात है कि देश का ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर बढ़ रहा है। लेकिन हमें समझना होगा कि संगठित क्षेत्र की यह बढ़ोतरी किस कीमत पर हो रही है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान लीवर कंपनी ने अपनी एक रिपोर्ट में यह स्वीकार किया है कि उनके उत्पादों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन यह बढ़ोतरी असंगठित क्षेत्र की कंपनियों के द्वारा स्थानीय मांग को पूरा न कर पाने के कारण हुई है।

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यानी असंगठित क्षेत्र की कंपनियां बंद हो रही हैं, या उनका उत्पादन गिर रहा है। इसका सीधा लाभ संगठित क्षेत्र को मिल रहा है। उदाहरण के लिए देश का ई-कॉमर्स सेक्टर लगभग 30 से 40 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। लोग अपने घरों में बैठकर पोर्टल पर खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन पड़ोस की बनिये की दुकान की चीजें नहीं बिक रही हैं। इन सेक्टर की फैक्ट्रियों में कामकाज के सुस्त होने से लोगों के रोजगार पर असर पड़ रहा है, उनकी खरीद क्षमता खत्म हो रही है। केंद्र सरकार को समझना पड़ेगा कि कृषि और असंगठित सेक्टर के लोगों के पास रोजगार न होने से उनकी आय घटेगी, इससे उनकी खरीद क्षमता प्रभावित होगी और इससे बाद में संगठित क्षेत्र के उत्पादों की बिक्री भी घटेगी। इसलिए केंद्र सरकार को असंगठित क्षेत्र को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए जो सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है।

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