हालांकि, भारत ने अमेरिका की इन मांगों पर प्रतिरोध दिखाया है। खासकर कृषि और डेयरी के क्षेत्र में। इसकी वजह है भारत का बड़ा कृषि क्षेत्र, जो कि उपज को पैदा करने और इसकी बिक्री के लिए सबसे अधिक भारत के बाजार पर ही निर्भर है। ऐसे में अगर अमेरिका के कृषि उत्पाद कम दरों पर भारत में मुहैया होते हैं तो इससे भारतीय किसानों को झटका लग सकता है। इतना ही नहीं इससे भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मुहैया कराने की प्रणाली भी मुश्किल में आ सकती है।
India US Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बनी सहमति; ट्रंप की समयसीमा से एक दिन पहले हो सकता है एलान
भारत इस व्यापार समझौते से क्या चाहता है?
बताया जाता है कि व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू होने के दौरान भारत अपने निर्यात किए जाने वाले प्रमुख उत्पादों पर अमेरिका से कोई आयात शुल्क नहीं चाहता था। इनमें टेक्सटाइल (कपड़ा) क्षेत्र से जुड़े उत्पाद, चमड़ा उत्पाद, फार्मा क्षेत्र के उत्पाद, कुछ इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पाद और ऑटो क्षेत्र के उत्पाद शामिल थे।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ट्रंप प्रशासन भारत के उत्पादों पर तुरंत टैरिफ को घटाकर शून्य रखने पर सहमत नहीं है। दूसरी तरफ भारत अमेरिका के साथ समझौते में इस बात की गारंटी भी चाहता है कि एक बार डील होने के बाद उत्पादों पर भविष्य में टैरिफ नहीं बढ़ाया जाएगा।
भारत का कृषि और डेयरी क्षेत्र अब तक सरकार के संरक्षण में रहा है। कृषि प्रधान देश होने की वजह से भारत ने लगभग सभी देशों पर टैरिफ की उच्च दरें लगाई हैं। इसके जरिए भारत अपने किसानों और उनके उत्पादों को संरक्षण देने की मंशा रखता है। इसी तरह भारत ने अब तक जितने भी देशों से मुफ्त व्यापार समझौते किए हैं, उनके लिए अपने डेयरी क्षेत्र को न खोलने का फैसला तय रखा है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे सैयद अकबरुद्दीन के मुताबिक, भारतीयों के लिए इससे ज्यादा परेशान करने वाला विचार नहीं होगा कि उनकी सरकार को एक विदेशी नेता की तरफ से धौंस जमाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में एक ऐसा व्यापार समझौता, जो कि दोनों देशों की जीत हो सकता था, वह अब साझेदारी की जगह समर्पण के तौर पर भी देखा जा सकता है।