लद्दाख में चीनी सैनिकों के साथ भारतीय जवानों की हिंसक झड़प के बाद जनता में भारी गुस्सा है। केंद्र सरकार के अलावा व्यापारी संगठन भी चीनी उत्पादों से हाथ पीछे खींचने की तैयारी में जुटे हैं। अब ऐसे समय में सवाल यह उठता है कि चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने की स्थिति में हमारे पास विकल्प क्या है।
चीन को टक्कर देने के लिए भारत के एमएसएमई सेक्टर को आगे बढ़ाया जा सकता है। चीन के ऐसे बहुत से उत्पाद हैं जो हमारे देश में बनते हैं, लेकिन वे महंगे होने के कारण चीनी बाजार का मुकाबला नहीं कर पाते।
भारतीय त्योहारों पर भी अब चीनी सामान बिकता है। होली, दीवाली से लेकर दशहरा, रक्षाबंधन और दूसरे त्योहारों पर बाजार में जो सामान बिकता हैं, उनमें ज्यादातर चीन निर्मित होती हैं। इनमें ऐसा कोई उत्पाद नहीं होता, जिसे भारत में न बनाया जा सकता हो, मगर सस्ता होने के कारण हम उसे चीन के बाजार से खरीद लेते हैं।
एसपी शर्मा का कहना है, हमें यही परंपरा तोड़नी होगी। इसके लिए सरकार को सस्ती दर पर कर्ज देना होगा। मशीनरी उपलब्ध करानी पड़ेगी। हो सकता है कि ट्रेनिंग और तकनीक को लेकर भी कोई योजना बनानी पड़े।
इसमें कुछ समय लग सकता है, लेकिन एमएसएमई सेक्टर चीन के बाजार को कड़ी देने में सक्षम है। एमएसएमई के पास क्षमता है, केवल उसे विकसित करना है।
किसी देश द्वारा दूसरे राष्ट्र में अपने उत्पादों को लागत से भी कम दाम पर बेचने को डंपिंग कहा जाता है। इसका नुकसान यह होता है कि इससे घरेलू उद्योगों का सामान महंगा होने के कारण वह अपने ही बाजार में ही पिट जाता है।
सरकार इसे रोकने के लिए एंटी डंपिंग ड्यूटी लगा देती है। मान लिया जाए कि किसी देश में एक वस्तु का दाम 100 रुपये है तो वह उसी कीमत पर दूसरे देश को उस वस्तु का निर्यात कर सकता है।
अगर वह देश उस वस्तु को सौ रुपये की बजाए 65 या 75 रुपये में निर्यात करता है, तो आयातक देश उस माल पर ऐंटी डंपिंग ड्यूटी लगा सकता है। इसका फायदा यह होता है कि आयातक देश की वे इकाइयां नुकसान में जाने से बच जाती हैं, जो विदेशी कंपनियों जैसे उत्पाद तैयार करती हैं।
कोरोना संक्रमण के लॉकडाउन में केंद्र सरकार ने सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए एमएसएमई को बढ़ावा दिया था। चूंकि इसे आर्थिक संवृद्धि का बड़ा कारक माना जाता है, इसलिए सरकार ने इसकी परिभाषा में संशोधन कर उसे विस्तार दे दिया है।
केंद्र सरकार ने एमएसएमई का दायरा बढ़ाकर इसकी पूर्ण श्रमता को विकसित होने का एक जरिया प्रदान कर दिया है। सरकार का यह फैसला एमएसएमई के अलावा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और जीडीपी में उछाल लाएगा।
एमएसएमई में निवेश और टर्नओवर की सीमा बढ़ने से इसका शेयर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ जाएगा। बतौर एसपी शर्मा, मौजूदा स्थिति में यह शेयर करीब 42-50 फीसदी है, जो कि अगले दो साल में बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा जीडीपी में भी मैन्युफैक्चरिंग का शेयर बढ़ जाएगा। अभी यह शेयर 15-16 फीसदी है, जबकि अगले तीन साल में यह बढ़कर 20 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है।
केंद्र सरकार ने मुश्किल में फंसे दो लाख एमएसएमई के लिए 20,000 करोड़ सबॉर्डिनेट डेट का प्रावधान किया है। सरकार सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट के तहत 4,000 करोड़ रुपये की मदद देगी।
बैंकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एमएसएमई के प्रमोटर्स को इकाई में अपनी मौजूदा हिस्सेदारी के 15 फीसदी के बराबर सबॉर्डिनेट डेट प्रदान करें। इसकी अधिकतम सीमा 75 लाख रुपये तय की गई है।
सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये के कोष के साथ एक फंड ऑफ फंड की स्थापना करने का निर्णय लिया है। इसके जरिए भी एमएसएमई सेक्टर को इक्विटी फंडिंग में मदद की जाएगी। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना था कि एमएसएमई को प्रोत्साहन देने का फैसला अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा।
कैबिनेट ने दबावग्रस्त एमएसएमई के लिए 20,000 करोड़ रुपये के अधीनस्थ कर्ज को मंजूरी दी है। इससे लिक्विडिटी की तंगी झेल रहे करीब 2 लाख एमएसएमई को फायदा पहुंचेगा।