आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआईपीएएम) ने पूरी प्रक्रिया पर सफाई दी है। विभाग का कहना है कि बैंक की बिक्री के लिए दूसरे दौर की बोली तय प्रक्रिया के तहत कराई गई और आरक्षित मूल्य में कोई बदलाव नहीं किया गया। कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 53,000 करोड़ रुपये में बेचने की योजना को 14 अक्तूबर को मंजूरी दी गई थी। ऐसे में सवाल है कि बैंक की कीमत कैसे तय हुई और बोली प्रक्रिया में किन नियमों का पालन किया गया?
आईडीबीआई बैंक की बिक्री प्रक्रिया पर विवाद क्यों उठा?
डीआईपीएएम ने यह सफाई बैंक के मूल्यांकन और कनाडा की संभावित खरीदार कंपनी फेयरफैक्स की बोली को लेकर उठे सवालों के बाद दी है। बैंक यूनियन समेत कई पक्षों ने मूल्यांकन और बोली की कीमत पर सवाल उठाए थे। विभाग ने कहा कि दूसरे दौर की बोली के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को सचिवों के मुख्य समूह (सीजीडी) ने तय किया था। इस समूह को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने प्रक्रियागत मुद्दों और नियमों से जुड़े बदलावों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया था।
दूसरे दौर की बोली की जरूरत क्यों पड़ी?
डीआईपीएएम के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में पहले दौर की बोली कराई गई थी, लेकिन उस समय प्राप्त बोलियों को मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद पहले दौर की प्रक्रिया का आगे कोई प्रभाव नहीं रहा। दूसरे दौर को बेहतर प्रस्ताव मांगने की प्रक्रिया भी कहा गया है। विभाग ने बताया कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई आंतरिक प्रक्रिया पहले से निर्धारित नहीं थी। इसलिए सीजीडी ने अगस्त 2017 में सीसीईए से मिले अधिकारों के तहत दूसरे दौर की प्रक्रिया तय की।
बैंक की कीमत तय करने में किन बातों का ध्यान रखा गया?
डीआईपीएएम ने स्पष्ट किया कि बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए कोई पहले से तय मूल्य मानक नहीं था। कंपनियां अपने आकलन के आधार पर गोपनीय वित्तीय प्रस्ताव देती हैं। बैंक का उचित मूल्य पता करने के लिए दो स्वतंत्र सलाहकारों ने अलग-अलग तरीकों से मूल्यांकन किया। कारोबार का मूल्यांकन लेनदेन सलाहकार के माध्यम से किया गया। इसमें बाजार में समान कंपनियों के मूल्यांकन की पद्धति भी अपनाई गई। उपयुक्त तुलनीय सौदे उपलब्ध नहीं होने के कारण सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को आधार बनाया गया।
बोली और मूल्यांकन की गोपनीयता कैसे रखी गई?
डीआईपीएएम के मुताबिक, प्रक्रिया को इस तरह रखा गया कि बोली लगाने वाली कंपनियों को स्वतंत्र एजेंसियों के मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी। वहीं, मूल्यांकन करने वाली एजेंसियों को वित्तीय बोलियों तक पहुंच नहीं थी। दोनों तरह की जानकारी केवल सीजीडी के पास थी, ताकि वह प्रस्तावों की उचितता का आकलन कर सके। विभाग ने यह भी बताया कि मूल्यांकन पद्धति की अप्रैल 2026 में समीक्षा की गई थी। मार्च 2026 के वित्तीय खाते अप्रैल के अंत में सार्वजनिक होने के बाद मई में मूल्यांकन एजेंसियों ने अपने आकलन में संशोधन शुरू किया।
53 हजार करोड़ रुपये के सौदे में किसे कितनी रकम मिलेगी?
सरकार ने 14 अक्टूबर को आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने की मंजूरी दी थी। यह सौदा करीब 53,000 करोड़ रुपये का है। इसमें सरकार की 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत लगभग 26,620 करोड़ रुपये और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी की कीमत करीब 26,440 करोड़ रुपये बताई गई है। फेयरफैक्स प्रति शेयर 81 रुपये देगी, जबकि दो स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों ने उचित मूल्य 75.99 रुपये प्रति शेयर तय किया था।
- कर विवाद का प्रावधान: मूल्यांकन में विवादित कर मांगों को भी शामिल किया गया। योग्य बोलीदाताओं के अनुरोध पर क्षतिपूर्ति का प्रावधान रखा गया, जिसके तहत संभावित देनदारी 627 करोड़ रुपये बताई गई।
- सरकार को मिलने वाला लाभ: डीआईपीएएम के अनुसार, इस प्रावधान के बावजूद सामने आई बोली की कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई, जिससे सरकार और एलआईसी के लिए सौदे का मूल्य बढ़ा।
- आगे क्या होगा: यह क्षतिपूर्ति तभी लागू होगी, जब अतिरिक्त कर मांग का भुगतान करना पड़े। विभाग ने इसे कम संभावना वाली स्थिति बताया और कहा कि इससे सरकार के राजस्व पर कुल मिलाकर असर नहीं पड़ेगा। सौदा चालू वित्त वर्ष के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक की नियामकीय मंजूरी जरूरी होगी।