सरकार ने कहा है कि घाटे में चलने वाले उपक्रमों को बंद करने के लिए सरकारी कंपनियों को दिवालिया अदालत में जाना चाहिए। इससे समाधान में तेजी आएगी। सरकार इन कंपनियों में अपनी होल्डिंग कम करना चाहती है। सोमवार को जारी निर्देश के अनुसार, शीर्ष कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति से मंजूरी मिलने के तीन महीने के भीतर घाटे में चल रही कंपनी के समाधान के लिए इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के तहत दिवालिया प्रक्रिया के लिए आवेदन दाखिल करना होगा।
सरकार उस दिन से नौ महीनों तक घाटे में चलने वाली इकाइयों को बंद करने की सोच रही है, जिस दिन से वह फर्म मंजूरी मांगती है। मूल कंपनियों के बोर्ड को उनकी सहायक कंपनियों की भूमि संपत्तियों को अलग करने के लिए कहा गया है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भूमि विवाद इकाइयों को बंद करने में बाधा न बने। फर्मों को पट्टे पर दी गई भूमि के लिए राज्य सरकारों से देय किसी भी मुआवजे को बट्टे खाते में डालने के लिए भी कहा गया है।
वर्तमान नियम के तहत चुन सकती हैं विकल्प
सरकार ने कहा कि राज्य की कंपानियां कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय से संपर्क करके इकाइयों को बंद करने का विकल्प चुन सकती हैं। वर्तमान में ऐसा नियम है। इससे सरकारी कंपनियों को कम करने में मदद मिलेगी। सरकार लगातार विनिवेश के जरिये इनकी संख्या कम भी कर रही है।
स्वतंत्र निदेशकों को नियुक्त करने और हटाने के दो नए विकल्प पेश
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कंपनियों के निदेशक मंडल में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति और उन्हें हटाने को लेकर नया विकल्प पेश किया है। नए विकल्प के तहत स्वतंत्र निदेशकों को नियुक्त करने और उन्हें हटाने के लिए दो मानदंड अपनाए जा सकते हैं। साधारण बहुमत से पारित प्रस्ताव व अल्पांश शेयरधारकों का बहुमत।
वर्तमान में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति या निष्कासन एक विशेष प्रस्ताव के जरिये होता है। विशेष प्रस्ताव पारित होने के लिए निदेशक मंडल से समर्थन में 75% वोट की जरूरत होती है।
सेबी के अनुसार, नए विकल्प को प्रभाव में लाने के लिए सूचीबद्धता बाध्यता व खुलासा जरूरत (एलओडीआर) नियम में संशोधन किया गया है। वैकल्पिक व्यवस्था में स्वतंत्र निदेशक की नियुक्ति के लिए विशेष प्रस्ताव को जरूरी बहुमत नहीं मिलने पर नए मानदंड अपनाए जा सकते हैं।