फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वैश्विक अर्थव्यवस्था: तेल और कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि से किन देशों को हुआ फायदा और नुकसान?

Fri, 12 Mar 2021 02:56 PM IST
‌डिंपल अलावाधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • नवंबर 2020 से अब तक तेल की कीमत में 75 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
  • हर उत्पाद में इस्तेमाल होने वाला कॉपर अब एक दशक के पहले के स्तर पर कारोबार कर रहा है।
  • मई से लेकर अब तक हर महीने खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। 
  • कई देशों के निर्यात में भी सुधार हुआ है।
  • लेकिन जो देश आयात पर ज्यादा निर्भर हैं, उनके लिए यह एक बोझ की तरह है।
विज्ञापन
जानिए किन देशों को हुआ फायदा और नुकसान - फोटो : pixabay
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

नवंबर 2020 से अब तक तेल की कीमत में 75 फीसदी का इजाफा हुआ है। विश्व की अर्थव्यवस्थाओं ने टीकाकरण का काम शुरू कर दिया है। ऐसे में फैक्टरियां फिर से खुलने लगी हैं और कई महीनों से दिक्कतों से जूझ रहे एविएशन सेक्टर में भी सुधार आया है। कार से लेकर वॉशिंग मशीन और विंड टर्बाइन तक, हर उत्पाद में इस्तेमाल होने वाला कॉपर अब एक दशक के पहले के स्तर पर कारोबार कर रहा है। मई से लेकर अब तक हर महीने खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़े हैं। 

विज्ञापन


इसके साथ ही कई देशों के निर्यात में भी सुधार हुआ है। सऊदी अरब और रूस जैसे देशों का कारोबार बढ़ा है। लेकिन ट्रेड के हमेशा दो पहलू होते हैं। जो देश आयात पर ज्यादा निर्भर हैं, उनके लिए यह एक बोझ की तरह है और बॉन्ड व मुद्रा बाजारों में इसके परिणाम झेल रहे हैं। 

भारत कच्चे तल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है। महंगे तेल से हो रही परेशानी को लेकर भारत ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) और उसके सहयोगी देशों से तेल उत्पादन बढ़ाने के लिए अपील भी की थी। तुर्की को भी इसके परिणाम झेलने पड़े हैं। तुर्की की महंगाई दर 15 फीसदी से ज्यादा हो गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार आइए जानते हैं इस दौरान कौन से देश फायदे में रहें और किन देशों को नुकसान हुआ।

विज्ञापन

फायदे में रहे ये देश-

ऑस्ट्रेलिया 
पिछले साल लागू हुए लॉकडाउन ने ऑस्ट्रेलिया में करीब तीन दशकों बाद पहली मंदी आई। लेकिन 2021 में सरकार को सुधार की उम्मीद है। दिसंबर में लोहे की बिक्री उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इसके साथ ही गेहूं में भी तेजी से व-द्धि दर्ज की जा रही है। वहीं पशुपालक बीफ की मांग को लेकर अब भी संघर्ष कर रहे हैं। नवंबर के अंत से लेकर अब तक ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का प्रदर्शन अन्य देशों के मुकाबले सबसे बेहतर रहा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यह पांच फीसदी मजबूत हुआ है। 

चाइल 
दुनिया के सबसे बड़े तांबा उत्पादक चाइल की ताकत भी वित्तीय बाजारों में स्पष्ट दिखाई दी। पेसो पिछले तीन महीनों में डॉलर के मुकाबले बढ़ने वाली एकमात्र प्रमुख लैटिन अमेरिकी मुद्रा रही। इतना ही नहीं, दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते शेयर बाजारों में चाइल के शेयर बाजार का भी नाम रहा। हालांकि तीन दशक पहले लोकतंत्र में वापसी के बाद से चाइल के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती पेश की। लेकिन चाइल के वित्त में सुधार हो रहा है। लगभग एक दशक में पहली बार लाल धातु की कीमत चार डॉलर प्रति पाउंड से अधिक हो गई। साथ ही फरवरी में कॉपर का निर्यात 3.9 अरब डॉलर रहा, जो एक माह पहले के आंकड़े से 42 फीसदी ज्यादा है।

जाम्बिया 
जाम्बिया के लिए भी ऐसी ही स्थिति रही। जाम्बिया के कुल निर्यात का करीब 80 फीसदी हिस्सा कॉपर का है। अगस्त 2021 में जाम्बिया के राष्ट्रपति एडगर लुंगु एक बार फिर से चुनावी लड़ाई का सामना करेंगे। जाम्बिया में मुद्रास्फीति दर 22 फीसदी तक बढ़ गई है। लुंगु को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज की उम्मीद है, साथ ही वे चीनी ऋणों के पुनर्गठन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

इराक
पिछले साल सभी तेल व प्राकृतिक गैस के निर्यात पर अधिक निर्भर रहने वाले देश (पेट्रोस्टेट्स) घाटे में रहे, लेकिन इराक को इस दौरान लाभ हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, इराक की अर्थव्यवस्था अन्य प्रमुख तेल निर्यातकों से लगभग 11 फीसदी गिरी। सरकार शिक्षकों और सिविल सेवकों को समय पर वेतन देने में असफल रही और इराकियों ने बिजली कटौती, टूटी-फूटी सड़कों, नौकरियों की कमी और अस्पतालों की बुरी स्थिति के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन किया। महामारी की वजह से ओपेक देश बुरी तरह प्रभावित हुए। इराक तेल उत्पादन का दूसरा सबसे बड़ा देश है। सऊदी अरब सहित अन्य सदस्यों ने उत्पादन में कटौती करने में विफल रहने के लिए बागदाद की आलोचना की। लेकिन जैसा ही कच्चे तेल के बाजार में तेजी आई, साल 2020 की दूसरी तिमाही में इराक का मासिक राजकोषीय राजस्व लगभग तीन अरब डॉलर से पांच अरब डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि यह अभी भी राज्य के बजट को संतुलित करने के लिए काफी नहीं है, लेकिन इराक के लिए ये बड़ी राहत है।
विज्ञापन

घाटे में रहे ये देश-

मिस्र 
मिस्र दुनिया में गेहूं के सबसे बड़े खरीदार और शुद्ध तेल का आयातक है। जब भी कमोडिटी की कीमतें बढ़ती हैं, मिस्र बुरी तरह से पीड़ित होता है। यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है क्योंकि लाखों लोग सब्सिडी वाली रोटी पर निर्भर हैं। राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सिसी की सरकार मुद्रास्फीति और उच्च तेल की कीमत से खुद को बचाने की कोशिश कर रही है। मिस्र बाजार में अधिक हेजिंग कॉन्ट्रैक्ट खरीदकर उच्च तेल लागत के खिलाफ खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है। विदेशी निवेशक अभी भी स्थानीय बॉन्ड खरीद रहे हैं। लेकिन विश्लेषकों के ब्लूमबर्ग सर्वेक्षण के अनुसार, इस साल सकल घरेलू उत्पाद केवल 2.9 फीसदी रह सकता है। 

पाकिस्तान
उच्च खाद्य और ईंधन की कीमतों ने पहले ही पाकिस्तान में सामाजिक अशांति पैदा कर दी है। विपक्ष ने पिछले साल प्रधानमंत्री इमरान खान के इस्तीफे की मांग करते हुए राष्ट्रव्यापी रैलियों का भी आयोजन किया। पिछले महीने उनकी सरकार ने राज्य कर्मचारियों के वेतन में 25 फीसदी की वृद्धि करके उन्हें जवाब दिया। व्यापार के बंद होने और वायरस के प्रसार को रोकने के लिए प्रतिबंधों का आर्थिक प्रभाव केवल तभी समाप्त होगा जब कमोडिटीज और पाकिस्तान के आयात बिल में वृद्धि होगी।

डोमिनिकन रिपब्लिक
यदि मिस्र और पाकिस्तान जैसे देश कमोडिटी साइकल से जूझ रहे हैं, तो छोटे देशों की अर्तव्यवस्था भी निश्चित रूप से प्रभावित हो रही है। डोमिनिकन रिपब्लिक कैरिबियन में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो सकती है, लेकिन इसकी जीडीपी न्यू हैम्पशायर की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं है। महामारी से उबरने के लिए पर्यटन उद्योग के पास मौका था लेकिन ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण प्रमुख पर्यटन उद्योग के लिए यह मुश्किल है। 110 लाख लोगों वाला यह राष्ट्र भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। वाहनों के लिए गैसोलीन और डीजल के अलावा, इसे बिजली उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस, कोयला और ईंधन तेल का आयात करना पड़ता है। इस साल देश के डॉलर बॉन्ड में नौ फीसदी की गिरावट आई है, जिससे यह सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले उभरते बाजारों में से एक हो गया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें