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अगले साल से अर्थव्यवस्था में दिखेगा सुधार: डीके अग्रवाल

Mon, 02 Dec 2019 11:18 AM IST
paliwal पालीवाल बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : PTI
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सरकार का कहना है कि विकास दर सुस्त हुआ है, लेकिन अर्थव्यवस्था में मंदी नहीं है। हालांकि, कोर सेक्टर और जीडीपी के आंकड़े निराशाजनक हैं। इस पर पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष डीके अग्रवाल का कहना है कि यह सब अल्पकालिक है। सरकार के उपायों से अगले साल से अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेगा। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने डीके अग्रवाल से बातचीत की। पेश है अंश :

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प्रश्न- पिछले सप्ताह संसद में नया श्रम कानून पेश किया गया। इसका उद्योग जगत और अर्थव्यवस्था पर क्या असर दिखेगा?
उत्तर- सकारात्मक असर दिखेगा। एक तरह से कहें तो उद्योग जगत इस तरह के श्रम कानूनों की दशकों से मांग कर रहा था। इससे तत्काल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। नए श्रम काननू में प्रावधान किया गया है कि यदि कोई उद्यमी एक साल के लिए फिक्स्ड टर्म इंप्लायमेंट पर किसी को रखता है तो उसे एक साल तक पक्के कर्मियों की तरह सभी सुविधाएं मिलेंगी। इससे मौसमी काम करने वाले उद्यमी भी लोगों को रोजगार देने में नहीं हिचकेंगे। पहले वे डरते थे कि एक बार पक्की नौकरी पर रख ली तो उसे निकाल नहीं सकेंगे। अब यदि किसी उद्यमी के पास काम बढ़ा तो वह तुरंत बाजार से फिक्स्ड टर्म इंप्लायमेंट पर लोगों को रख सकेगा। 

प्रश्न- हाल ही में चालू वर्ष की दूसरी तिमाही के जीडीपी और कोर सेक्टर के आंकड़े आए हैं। इस पर आपका क्या कहना है?
उत्तर- इन आंकड़ों को देखा जाए तो लगता है कि अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति के लिए सिर्फ हम ही जिम्मेदार नहीं हैं। देखिए... भारत की अर्थव्यवस्था कोई क्लोज्ड इकोनॉमी नहीं है। दुनियाभर की अर्थव्यवस्था में जो कुछ चलेगा, उसका असर तो हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा ही। अमेरिका-चीन के बीच व्यापार को लेकर जो खींचतान चल रही है, उससे हम क्या पूरी दुनिया के देश प्रभावित हुए हैं। इन सबका समन्वित असर हमारे कोर सेक्टर के आंकड़ों पर दिखा है और उसकी वजह से जीडीपी के आंकड़े प्रभावित हुए हैं। लेकिन इससे ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। अगली तिमाही तक स्थिति में सुधार होगा।
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प्रश्न- आप किस आधार पर कह रहे हैं कि अगली तिमाही में कुछ सुधार दिखेगा?
उत्तर- देखिए... सरकार ने पिछले तीन-चार महीने में अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए कई कदम उठाए हैं। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सबसे पहले विदेशी और घरेलू निवेशकों पर सरचार्ज बढ़ाई के अपने फैसले को वापस ले लिया। इसके अलावा, बैंकों को 70,000 करोड़ रुपये की नई पूंजी देने की घोषणा की। इससे बैंकों की पूंजी बढ़ेगी और वे पांच लाख करोड़ रुपये तक का ऋण दे सकेंगे। इसके बाद कोयला क्षेत्र में सुधार किया गया और खदान एवं कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी दी गई। इसके बाद 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बैंक बनाने की घोषणा हुई। उद्योग जगत को सबसे ज्यादा आसानी कॉरपोरेट कर में कटौती से हुई। पहले कॉरपोरेट जगत पर 35-36 फीसदी तक का कर भार पड़ता था। इसमें सभी को अब कम-से-कम छह फीसदी का फायदा होगा। यही नहीं, नए निवेश को आकर्षित करने के लिए 15 फीसदी के कॉरपोरेट कर का एलान किया गया है। इसका असर अगले साल से दिखना शुरू हो जाएगा।

प्रश्न- सरकार ने आसान कर्ज के लिए सितंबर-अक्तूबर में देश के 400 जिलों में शामियाना बैठक आयोजित की थी। इसका उद्योग जगत क्या तात्कालिक असर दिखा या दिखेगा?
उत्तर- इसका तात्कालिक असर उपभोक्ताओं पर दिखेगा, उद्योग जगत पर नहीं। उद्योग जगत के संबंध में दूरगामी परिणाम होंगे। आप इस चीज को समझिए कि शामियाना बैठक कोई लोन मेला नहीं था। उसमें आम नागरिकों को बैंकिंग तंत्र के बारे में जागरूक करना था। इस मेले में उनके खाते खोले गए, उन्हें फाइनेंशियल इंक्लूजन से जोड़ा गया। उन्हें बैंकिंग प्रणाली और डिजिटल ट्रांजेक्शन के बारे में जागरूक किया गया, जिससे उन्हें आसानी होगी। कोई भी कारोबारी या उद्योगपति इतनी बातें तो जानता ही है। हां, उससे हमें यह फायदा हुआ कि लोग डिजिटल ट्रांजेक्शन के प्रति जागरूक हुए और इसकी स्वीकार्यता बढ़ी।

प्रश्न- उद्योग जगत और खासकर लघु उद्यमी तरलता की कमी की शिकायत करते हैं। अभी क्या स्थिति है?
उत्तर- लघु उद्यमियों के लिए तो अभी भी फंड की दिक्कत है। इस समय बेहतर मतलब ‘ए और एए’ रेटिंग वाली कंपनियों को छोड़ दें तो अन्य कंपनियों को कर्ज पाने में दिक्कत हो रही है। लघु उद्यमियों में अधिकतर कंपनियां इस शर्त को पूरा नहीं कर पाती हैं, इसलिए उन्हें बैंकों से ऋण नहीं मिल पाता है। इन्हें पहले गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से आसानी से लोन मिल जाता था, लेकिन तलरता में कमी की वजह से वहां से भी अब कर्ज लेना आसान नहीं रह गया है। ऐसी कंपनियां अब या तो रिश्तेदारों की मदद से काम रहीं हैं या फिर साहूकारों के भरोसे।

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