भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव देश में उत्तर और दक्षिण में करों के असमान वितरण पर अपनी राय रखी है। सुब्बाराव ने कहा है कि केंद्र और राज्य स्तर पर प्रबुद्ध नेतृत्व ही राज्यों के बीच कर पूल के असमान वितरण पर फैसला लेकर उत्तर-दक्षिण के जटिल अंतर को सुलझा सकता है। उन्होंने कहा है कि यह मामला वित्त आयोग की पहुंच से बाहर का है।
आंध्र प्रदेश के वित्त सचिव और केंद्रीय वित्त सचिव समेत विभिन्न पदों पर रह चुके सुब्बाराव ने अपनी नई किताब 'जस्ट ए मर्सीनरी: नोट्स फ्रॉम माई लाइफ एंड करियर' में राजकोषीय संघवाद के मुद्दों पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने पीटीआई से कहा, ''इसके समाधान के लिए केंद्र और राज्य स्तरों पर प्रबुद्ध नेतृत्व की जरूरत होगी जो राजनीति से परे देख सके और आगे के अनुकूल रास्ते पर आम सहमति बना सके।" सुब्बाराव के अनुसार तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे अमीर राज्यों को केंद्र के करों में प्रत्येक रुपये के योगदान के बदले एक रुपये से कम हिस्सा मिलता है, जबकि बिहार और झारखंड जैसे गरीब राज्यों को एक रुपये से अधिक हिस्सा मिलता है।
जनसंख्या के अद्यतन आंकड़ों के आधार पर 2026 में होने वाले परिसीमन को देखते हुए, सुब्बाराव ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में, दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर उत्तर की तुलना में अधिक तेजी से गिरावट आई है। उन्होंने कहा, "अगर इसके परिणामस्वरूप, दक्षिणी राज्य संसद की सीटों के मामले में अपना हिस्सा खो देते हैं तो उन्हें सब्सिडी की सीमा को पार करने की खुली प्रतिबद्धता के साथ कम राजनीतिक दबदबे की दोहरी मार का सामना भी करना पड़ेगा।"
सरकारों की ओर से मुफ्त उपहार (फ्रीबीज) देने के बारे में एक सवाल के जवाब में सुब्बाराव ने कहा कि एक गरीब देश में जहां लाखों लोग अच्छी आजीविका कमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां सबसे कमजोर तबकों को हस्तांतरण जरूरी है, वास्तव में यह अनिवार्य भी है। उन्होंने कहा, 'लेकिन यह सीमा के भीतर होना चाहिए, खासकर जब इन मुफ्त उपहारों को उधार लेकर वित्तपोषित किया जाता है।'
सुब्बाराव ने कहा कि राजनीतिक दल मतदाताओं को मुफ्त में लुभाने में एक-दूसरे से आगे निकल रहे हैं, यह वित्तीय रूप से खतरनाक है। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि सभी राजनीतिक दल इसके लिए दोषी हैं और किसी एक पर दोष मढ़ने की कोशिश एक गलत शुरुआत होगी। आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने जोर देकर कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता में आने वाली केंद्र सरकार को एक श्वेत पत्र जारी कर जनता को मुफ्त उपहार दिए जाने की लागत और लाभों के बारे में विस्तार से बताना चाहिए।