उन्होंने कहा, 'कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का अधिकार देने वाला कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में सहमति व्यक्त की है कि हड़ताल पर जाना आचरण नियमों के तहत एक गंभीर कदाचार है और सरकारी कर्मचारियों की ओर से किए गए उल्लंघन को कानून के अनुसार निपटने की आवश्यकता है।
इन निर्देशों में कहा गया है कि विरोध प्रदर्शन सहित किसी भी रूप में हड़ताल पर जाने वाले कर्मचारी को परिणाम भुगतने होंगे। उनके खिलाफ वेतन में कटौती के अलावा उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है।
पत्र में सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से कहा गया है कि आपके मंत्रालय व विभागों के तहत आने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को विभाग की ओर से जारी आचरण नियमों और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर से बरकरार रखे गए अन्य नियमों के तहत उपरोक्त निर्देशों के बारे में उपयुक्त रूप से सूचित किया जा सकता है।
साथ ही आदेश में प्रस्तावित विरोध व हड़ताल की अवधि के दौरान आवेदन करने वाले कर्मचारियों को आकस्मिक अवकाश या अन्य प्रकार के अवकाश को मंजूरी नहीं देने के निर्देश जारी किए जा सकते हैं और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि इच्छुक कर्मचारियों को कार्यालय परिसर में बाधा मुक्त प्रवेश की अनुमति दी जाए।
इस उद्देश्य के लिए संयुक्त सचिव (प्रशासन) को सुरक्षा कर्मियों के साथ समन्वय का काम सौंपा जा सकता है। मंत्रालय व विभाग के विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए उपयुक्त आकस्मिक योजना पर भी काम किया जा सकता है।
आदेश में कहा गया है कि यदि कर्मचारी धरना-प्रदर्शन या हड़ताल पर जाते हैं तो प्रस्तावित कार्यक्रम में भाग लेने वाले कर्मचारियों की संख्या का उल्लेख करने वाली एक रिपोर्ट उस दिन की शाम को डीओपीटी को दी जानी चाहिए। इस संबंध में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए एक संयुक्त सलाहकार तंत्र पहले से ही काम कर रहा है।
यह योजना सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने और सरकार के बीच सहयोग के सबसे बड़े पैमाने को सुरक्षित करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। निर्देश में कहा गया है, ''जेसीएम विभिन्न स्तरों पर अपने समक्ष लाए गए मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं और परामर्श प्रक्रिया अभी भी कर्मचारियों की ओर से सक्रिय सहयोग से काम कर रही है।"