दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले आधिकांश लोग बड़े चाव से 'जहरीली' सब्जियां खा रहे हैं, जिनसे कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। यह सभी सब्जियां यमुना किनारे उगायी जा रही हैं। इन सब्जियों में सीसा (लेड) और अन्य विषैले धातुओं की मात्रा तय मानकों से अधिक पाई गई है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल एनवॉयरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (NEERI) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि यमुना खादर में उगने वाली इन सब्जियों पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने 2015 में रोक लगा दी थी। इसके बावजूद खादर इलाके में किसान बहुल मात्रा में इनकी खेती कर रहे हैं। इन सब्जियों को दिल्ली स्थित थोक मंडियों जैसे कि आजादपुर, ओखला और गाजीपुर में बिक्री के लिए भेजा जा रहा हैं। जहां से यह सब्जियां छोटी मंडियों में बिकने के लिए भेजी जा रही हैं।
इससे पहले 2015 में मैगी में तय मात्रा से ज्यादा सीसा मौजूद होने की शिकायत सामने आई थी। उत्तर प्रदेश के फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की जांच में मैगी में लेड की मात्रा 17.2 पीपीएम मिली, जबकि यह 0.01 से 2.5 पीपीएम तक ही होनी चाहिए। जिसके बाद इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि उसके सबसे लोकप्रिय एफएमसीजी उत्पाद मैगी में लेड की मात्रा थी।
उत्तर प्रदेश के फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मैगी के सैंपल लिए थे। फूड सेफ्टी नियमों के मुताबिक, अगर उत्पाद में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) का इस्तेमाल किया जाता है, तो पैकेट पर इसका उल्लेख करना जरूरी है। एमएसजी से मुंह, सिर या गर्दन में जलन, स्किन एलर्जी, हाथ-पैर में कमजोरी, सिरदर्द और पेट की तकलीफें हो सकती हैं।
अगर कोई व्यक्ति इन हानिकारक सब्जियों का सेवन करता है, तो उसके फेफड़े, दिमाग, लीवर और किडनी तक खराब हो सकते हैं। वहीं यह रक्त कोशिकाओं को भी डैमेज कर सकता है। ज्यादा लंबे समय तक सेवन करने से कैंसर का भी खतरा बढ़ सकता है। गौरतलब है कि दिल्ली में यमुना केवल दो फीसदी हिस्से में बहती है, लेकिन इसमें राजधानी का 70 फीसदी प्रदूषित पानी बहाया जा रहा है।