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फंसे हुए कर्ज को लेकर जारी सर्कुलर निरस्त, आरबीआई को सुप्रीम कोर्ट से झटका

Wed, 03 Apr 2019 02:15 AM IST
गौरव द्विवेदी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आरबीआई को कड़ा झटका देते हुए बैंकों के फंसे हुए कर्ज से जुड़े 12 फरवरी, 2018 के सर्कुलर को गैरकानूनी करार दिया है। इस सर्कुलर के तहत 2000 करोड़ रुपये से अधिक वाले कर्जदारों द्वारा डिफॉल्ट करने की स्थिति में 180 कर्ज समाधान केलिए 180 दिनों का वक्त दिया गया था। इस तय सीमा पर कर्ज न चुकाने पर उसे इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड(आईबीसी) केदायरे में लाया जाएगा और उसे इंसॉल्वेंसी कोर्ट में भेज दिया जाएगा। 

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न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन और न्यायमूर्ति विनीत शरण की पीठ ने कहा है, %फंसे हुए कर्ज का समाधान इंसॉल्वेंसी कोड या किसी अन्य तरीकेसे निकाला जा सकता है। जब कोड केजरिए इसका समाधान इंसॉल्वेंसी कोड केद्वारा निकाला जा रहा हो तो आरबीआई सिर्फ धारा 35एए के तहत ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है।’
शीर्ष अदालत ने 12 फरवरी केसर्कुलर को बैंकिंग रेग्यूलेशन एक्ट की धारा-35एए के तहत गैरकानूनी करार दिया है। 

इस धारा के तहत केंद्र सरकार, आरबीआई को बैंकिंग और नॉन बैंकिंग कंपनियों केखिलाफ इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू करने से संबंधित सर्कुलर जारी करने केलिए अधिकृत कर सकती है। पीठ ने कहा कि इस सर्कुलर को धारा-35एए केतहत केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत नहीं करने से साफ है कि आरबीआई को स्वत: इस तरह का सर्कुलर जारी करने का अधिकार नहीं है। 
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12 फरवी, 2018 केइस सर्कुलर को वैधता को बिजली, दूरसंचार, स्टील, इंफ्रास्ट्रक्चर, चीनी, रसायनिक उर्वरक, सहित अन्य कंपनियों ने चुनौती दी थी। इन कंपनियों का कहना था कि इस नई व्यवस्था केकारण उन्हें वित्तीय समेत कई अन्य परेशानी हो रही है, जिनका इन क्षेत्रों से जुड़ी कंपिनयों केप्रबंधन की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं है। इन कंपनियों का कहना था कि यह सर्कुलर मनमाना है और बैंकिंग रेग्यूलेशन एक्ट और आरबीआई एक्ट केविपरीत है। उनका कहना था कि कुछ कर्ज का समाधान अंतिम चरण पर होता है लेकिन 180 दिनों की समय सीमा उनकेलिए चाकू के समान है।

वहीं आरबीआई का कहना था कि यह सर्कुलर 2000 करोड़ से अधिक वाले कर्जदारों के बारे में बैंकों को जानकारी देना है। आरबीआई का कहना है कि कर्ज समाधान केलिए छह महीने का वक्त पर्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को देखने केबाद पाया कि यह साफ है कि धारा-35एए केतहत किसी खास डिफॉल्ट या कर्जदार केखिलाफ निर्देश दिया जा सकता है। ऐसे में सामूहिक तौर पर इस तरह का निर्देश देना इस प्रावधान के विपरीत है। 

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