रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 6,21,940.85 करोड़ रुपये के रक्षा बजट को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की है। इसमें पूंजीगत व्यय के लिए 1.72 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे नाकाफी बता रहे हैं। रक्षा मंत्रालय से हाल में रिटायर हुए पूर्व अधिकारी का कहना है कि पिछले साल की तुलना में यह केवल 4.8 प्रतिशत बढ़ा है। पिछले साल से मंहगाई की दर जोड़ लें तो रक्षा बजट खास नहीं बढ़ा है, जबकि कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं।
वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि रक्षा क्षेत्र में चुनौतियां काफी बढ़ रही हैं। यूक्रेन-रूस के बीच में चल रही जंग ने साबित कर दिया है कि अब पुराने तरीके बदल रहे हैं। ड्रोन से हो रहे हमलों ने टैंक से होने वाले युद्ध की रणनीति को बदल कर रख दिया है। ऐसे में सैन्य बलों के आधुनिकीकरण से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
जम्मू संभाग में बढ़ रहा है खतरा
पिछले एक महीने में जम्मू-कश्मीर के जम्मू संभाग में आतंकियों ने हमले किए हैं। एक दिन पहले ही आतंकियों ने सेना के शिविर को निशाना बनाने की कोशिश की थी। अब तक हुए आतंकी हमले में करीब 12 जवान शहीद हो चुके हैं। जम्मू का आतंकी हमला नए संकेत दे रहा है और ऐसा लग रहा है कि सीमापार के दहशतगर्द पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के ईशारे पर घाटी के साथ-साथ इस मोर्चे पर आतंकवाद का दबाव बढ़ा रहे हैं। पिछले सप्ताह सुरक्षा मामलों की कैबिनेट बैठक में इस क्षेत्र से न केवल आतंकियों का सफाया मुख्य मुद्दा था, बल्कि जम्मू संभाग को सुरक्षित रखने के उपायों पर भी चर्चा हुई थी।
दूसरे दूसरे हिस्से में भी बढ़ रही है चुनौतियां
2020 में चीन के सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा की अवधारणा बदलने की कोशिश की थी। पड़ोसी देश के सैनिकों की इस कोशिश को नाकाम करने के लिए भारत ने लद्दाख क्षेत्र में 50 हजार अधिक सैनिकों, अग्रिम पंक्ति के जवानों, टैंक आदि को तैनात कर रखा है। लद्दाख क्षेत्र में मौसम की दुरूह परिस्थितियों से निबटने, रक्षा-साजो सामान के रख-रखाव और संभावित स्थितियों से निबटने में हर दिन कई करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके अलावा भावी चुनौतियों को देखते हुए बड़े पैमाने पर साजो सामान की जरूरत है। उस जरूरत के हिसाब से विशेषज्ञों को ज्यादा बजट की उम्मीद थी।
लद्दाख के साथ-साथ पूर्वोत्तर में चुनौतियां बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। मणिपुर की अस्थिरता भी सैन्य विशेषज्ञों, सामरिक रणनीतिक विशेषज्ञों और खुफिया एवं सूचना सेवा के अधिकारियों को चिंतित कर रही है। बताते हैं म्यांमार में जारी उथल-पुथल अभी थम नहीं रही है। म्यांमार में चीन और अमेरिका के भी अपने हित हैं। इसलिए देर-सबेर इस क्षेत्र में भी सुरक्षा ढांचे को चुनौती के हिसाब से चुस्त दुरुस्त करना पड़ सकता है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन हमेशा संवेदनशील रहता है और क्षेत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इसे देखते हुए जम्मू-कश्मीर से लगती नियंत्रण रेखा, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर निगरानी के ढांचे समेत तमाम उपायों पर जोर देना होगा। इसी तरह के प्रयास पूर्वोत्तर के लिए जरूर होते जा रहे हैं।
भारत के सामने मोर्चे पर एक तरफ पाकिस्तान है तो दूसरी तरफ चीन। जबकि रक्षा बजट के मामले में भारत चीन की तुलना में उसका दसवां हिस्सा खर्च करता है। चीन के पास ड्रोन्स, पांचवीं पीढ़ी के फाइटरजेट, अत्याधुनिक तकनीक के हथियार, रेडार, निगरानी के उन्नत उपकरण, वायु रक्षा प्रणाली समेत अन्य हैं। वह ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स में अब अमेरिका के बाद अपनी जगह बनाता जा रहा है। हालांकि भारत के पास सैन्यबल, युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों का काफी अधिक अनुभव है।
रक्षा बजट में कितनी हुई बढ़ोत्तरी?
इस बार के रक्षा बजट में वित्त मंत्री ने इस मद में 6,21,940.85 करोड़ रुपये (74 अरब अमेरिकी डॉलर) आवंटित किए हैं। इसमें 1.72 लाख करोड़ पूंजीगत व्यय के लिए है। इसमें 1.05518 लाख करोड़ रुपये रक्षा साजो-सामान, हथियार आदि की खरीद पर खर्च किए जा सकेंगे। रक्षा बजट, कुल बजट का 12.9 प्रतिशत है, जबकि कुल जीडीपी का 1.9 प्रतिशत। इसमें सैनिकों के पेंशन भत्ते भी शामिल हैं। यदि इसकी तुलना चीन और अमेरिका से की जाए तो भारत पीछे है। चीन ने पिछले साल 230 अरब डालर का रक्षा बजट घोषित किया था। जबकि अमेरिका का रक्षा बजट 860 अरब डालर के करीब है।
भारत का रक्षा बजट 2022 में पहली बार पांच लाख करोड़ रुपये के पार हुआ था और 5.25 लाख करोड़ आवंटित हुए थे। 2023 में यह बढक़र 5.94 लाख करोड़ रुपये हो गया था। पिछले साल के बजट से तुलना करें तो केवल 4.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञ कहते हैं कि इसमें यदि मंहगाई आदि के आंकड़ों को जोड़ लें तो यह बजट 2023-24 में आवंटित राशि से कम बैठेगा।