वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पूर्व चर्चा में शुक्रवार को किसानों के प्रतिनिधियों, कृषि विशेषज्ञों और कृषि से जुड़े विभागों के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कृषि और किसानों को मजबूत बनाने के लिए उनके विचार समझे। विशेषज्ञों ने किसानों को आर्थिक तौर पर सशक्त करने के लिए कई बहुमूल्य सुझाव दिए हैं, जिनका असर आने वाले बजट में दिखाई दे सकता है।
क्या करना चाहिए?
कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि उदारीकरण के बाद से केंद्र सरकारों का पूरा ध्यान बाजारों और बड़ी कंपनियों के विकास की ओर केंद्रित रहा है। इसका असर यह हुआ है कि देश का बहुसंख्यक युवा आज भी बेरोजगार है, किसानों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हुई है। इसका असर हुआ है कि रोजाना किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहा है। वह मजदूर के रूप में जीवन यापन करने को मजबूर हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि देश की आर्थिक तस्वीर बदलनी है, तो केंद्र सरकार की प्रमुखता में कृषि होनी चाहिए, जो आज भी हमारे देश की लगभग 60 फीसदी आबादी के जीवनयापन का मुख्य जरिया है। उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य उपलब्ध कराकर किसानों को बड़ी मदद दी जानी चाहिए।
50 फीसदी आबादी के लिए हो 50 फीसदी बजट
देवेंद्र शर्मा ने कहा कि देश के बजट का वित्तीय निवेश आबादी के अनुपात में होना चाहिए। देश का आधा बजट देश की आधी आबादी पर खर्च होना चाहिए। इस दृष्टि से देश का आधा बजट देश के किसानों पर खर्च होना चाहिए। इससे न केवल देश के सभी किसानों को उनकी संपूर्ण उपज के लिए उचित मूल्य (MSP) प्रदान किया जा सकता है, बल्कि इससे सभी किसान परिवार के लोगों, युवाओं-महिलाओं को रोजगार भी दिया जा सकता है जो कि किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होता है।
केंद्र सरकार का पिछला बजट लगभग 48 लाख करोड़ रुपये का था। पूरे देश के किसानों के लिए इसमें से केवल सवा लाख करोड़ रुपये के करीब खर्च किए गए थे। इसमें से भी लगभग 65 हजार करोड़ रुपये प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के जरिए दिया गया था। जबकि केंद्र सरकार का ध्यान पूरी कृषि को मजबूती देने की ओर होना चाहिए। उनका मानना है कि हर महीने 500 रुपये के करीब नकद सहायता देकर किसानों या कृषि की आर्थिक स्थिति नहीं बदली जा सकती।
एमएसपी को कानूनी गारंटी बनाए सरकार- पी. साईनाथ
कषि मामलों के विशेषज्ञ पी. साईनाथ ने अमर उजाला से कहा कि हर वस्तु का मूल्य बढ़ रहा है। इसी क्रम में किसानों के लिए फसल उत्पादन की कीमत इतनी अधिक बढ़ गई है कि अब कृषि एक घाटे का सौदा बन चुका है। इससे पूरे देश का किसान लगातार कर्ज के जाल में डूबता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को स्वामीनाथन फॉर्मूले के अनुसार हर किसान को एमएसपी की कानूनी गारंटी से बांधना चाहिए जिससे कृषि को आर्थिक तौर पर लाभ का सौदा बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि अनेक विकसित देशों में किसानों को भारी आर्थिक सहायता देकर उसे बेहतर स्थिति में लाया जाता है। यह कोशिश भारत में भी अपनाई जानी चाहिए।
'एमएसपी घातक प्रथा, दूसरे विकल्पों पर ध्यान दे सरकार'
कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना ने अमर उजाला से कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देना एक गलत प्रथा है। इससे कृषि और किसानों दोनों को नुकसान हुआ है। किसान केवल उन्हीं फसलों के उत्पादन की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जिसमें उन्हें ज्यादा एमएसपी मिलने की संभावना होता है। वे दूसरी फसलों से दूर जाते हैं। इससे फसलों की विविधता को नुकसान पहुंचता है। एमएसपी देने में उपज की गुणवत्ता पर कोई बात नहीं की जाती। खराब गुणवत्ता की उपज खरीदी जाती है, जिसे बाद में उपभोक्ता पसंद नहीं करता।
विजय सरदाना ने कहा कि एमएसपी देते समय यह बात सुनिश्चित की जानी चाहिए कि किसान उच्च गुणवत्ता की फसल ही सरकार को उपलब्ध कराएं। यदि फसल की गुणवत्ता बेहतर होगी, तो संभवतः किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। उपभोक्ता स्वयं ही उच्च गुणवत्ता की फसल बाजार से खरीद लेंगे।
केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त संस्थाओं को भी बेहतर परिणाम देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार के द्वारा वित्त पोषित कृषि शोध संस्थाओं को भारतीय वातावरण और परिस्थितियों के मद्देनजर बेहतर कृषकीय बीज, पादप और रसायन उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाना चाहिए।