भारत में हाल के समय में मंदी का संकट गहराता जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंकों पर फंसे कर्ज का संकट (एनपीए) बढ़ता जा रहा है। कई बड़ी कंपनियों ने लोन चुकाया नहीं है, जिससे बैंकों का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत में भी यही स्थिति है। यहां 2017 में जो संपत्ति बनी उसका 73 फीसदी हिस्सा केवल एक फीसदी लोगों के पास थी। देश की आधी आबादी को सिर्फ 1% हिस्सा मिला।
अभी भी खतरा है बरकरार
हालांकि इस आर्थिक मंदी के बाद भी खतरा बरकरार है। डाओ जोंस मार्च 2009 के बाद चार गुणा बढ़ चुका है। वहीं रेटिंग एजेंसी के बाजार पर आज भी पूरे विश्व में केवल 3 कंपनियों का कब्जा है। यह तीन कंपनियां ही रेटिंग व्यापार में प्रत्येक 10 डॉलर में से 9 डॉलर कमा रही हैं।
एक साल पहले भी अमेरिका के 10 बड़े बैंकों के पास आधी से ज्यादा संपत्ति थी और वो आज भी है। वहीं राष्ट्रपति ट्रंप भी 2010 में बने उस कानून को खत्म करने पर लगे हैं, जिसको इस मंदी के बाद लागू किया गया था।
अमेरिका ने शुरू किया व्यापार युद्ध
अमेरिका ने भारत और चीन सहित कई देशों से आयातित होने वाले सामान पर अतिरिक्त ड्यूटी लगाने का फैसला किया है। वहीं ईरान जैसे देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने से वहां से पेट्रोल भी आयात नहीं हो पाएगा। इससे कई देशों से अमेरिका का व्यापार युद्ध होने की आशंका फिर से दिखने लगी है। अगर व्यापार युद्ध होता है तो यह कुछ-कुछ फिर से विश्व को आर्थिक मंदी की और ले जाएगा।
अमेरिका को लगा था तब इतना झटका
10 साल पहले आर्थिक मंदी के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था को 6 से 14 ट्रिलियन डॉलर को नुकसान हुआ था इसके साथ ही देश के दो सबसे बड़े बैंक भी पूरी तरह से दिवालिया होकर समाप्त हो गए थे।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एमडी क्रिस्टीन लेगार्ड ने एक चेतावनी भरा ब्लॉग लिखा है। उन्होंने कहा है कि हालत अभी भी सुधरे नहीं हैं क्योंकि बैंकिंग सेक्टर में अभी भी पुरुषों का वर्चस्व है। बैंकिंग सेक्टर में अभी भी बड़े सुधार करने की जरुरत है। इस मंदी की उपज तो अमेरिका में हुई थी, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया में 2-3 सालों तक देखने को मिला था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 10 साल बाद भी ऐसी आर्थिक मंदी होने का खतरा बरकरार है या नहीं।
लीमैन सिस्टर्स होती तो न होती मंदी
लेगार्ड ने अपने ब्लॉग में लिखा कि कही 2008 में अगर अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स की जगह लीमैन सिस्टर्स होती तो फिर आर्थिक मंदी नहीं होती। अभी भी ब्रिटेन के चार दिग्गज बैंकों के सीईओ पुरुष हैं। वहीं, एफटीएसई में शामिल 100 बड़ी कंपनियों के बोर्ड में महिला डायरेक्टरों का अनुपात गिरता जा रहा है। कॉरपोरेट सेक्टर में भी महिलाओं की लीडरशिप उल्लेखनीय नहीं है।
फॉर्चून 500 कंपनियों में सिर्फ 24 महिला सीईओ
फॉर्चून 500 कंपनियों में 2018 तक सिर्फ 24 महिला सीईओ रह गई हैं। 2017 में इनकी संख्या 32 थी यानी इनकी संख्या में 25% की कमी आई है। फॉर्चून 500 कंपनियों में महिला नेतृत्व वाली कंपनियां एक दशक में बढ़कर 6.4% हुई है। 10 साल पहले ऐसी कंपनियों की हिस्सेदारी 2.6% ही थी।