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एनपीए के कारण पीएनबी को हुआ बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा घाटा 

Wed, 18 May 2016 11:44 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • पीएनबी को हुआ 5367 करोड़ का घाटा
  • बिजली वितरण कंपनियां और पंजाब में खाद्यान्न कर्जे बने मुसीबत के सबब
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पीएनबी
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विस्तार
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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए फंसे हुए कर्ज (एनपीए) भारी मुसीबत की वजह बनते जा रहे हैं। इस कर्ज की भरपाई के लिए पंजाब नेशनल बैंक ने भारी -भरकम प्रावधान किया है और इस वजह से इसे वित्त वर्ष 2015-16 की आखिरी तिमाही में 5367 करोड़ का शुद्ध घाटा उठाना पड़ा है। देश के बैंकिंग इतिहास
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में यह अब तक का सबसे बड़ा तिमाही घाटा है। कुल मिलाकर बैंक का अब तक का एनपीए एक साल पहले के एनपीए के तुलना में दोगुना होकर 55,818 करोड़ पर पहुंच गया है।

सार्वजनिक क्षेत्र के दूसरे बड़े बैंक पंजाब नेशनल बैंक को अपने फंसे हुए कर्जे की भरपाई के लिए  प्रोविजनिंग (प्रावधान) में तीन गुना इजाफा करना पड़ा है। अंतिम तिमाही में इसे 10485 करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग करनी पड़ी है। बैंक के इस खस्ता हाल के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बिजली वितरण कंपनियों और पंजाब में अनाज से जुड़े कर्ज हैं। इनकी भरपाई निकट भविष्य में मुश्किल लगती है। लिहाजा आगे भी बैंक के लिए हालात मुश्किल बने रहेंगे। बैंक को वित्त वर्ष 2014-15 की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च ) में 306.56 करोड़ का शुद्ध मुनाफा हुआ था।
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पीएनबी की प्रबंध निदेशक उषा अनंत सुब्रमण्यन ने पत्रकारों से कहा कि बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता की समीक्षा से पता चलता है कि इसका 11,380 करोड़ रुपये का लोन डूबत खाते में चला गया है। इसमें से 385 करोड़ का कर्ज तो अकेले डिस्कॉम (बिजली वितरण कंपनियां) के पास फंसा है। इसके अलावा पंजाब में खाद्यान्न संबंधित कर्जों की वसूली न होने से 167 करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग करनी पड़ी है। मार्च, 2016 के आखिर में सकल एनपीए बढ़कर 12.9 फीसदी पर पहुंच गया, जबकि एक साल पहले की इस अवधि में यह 6.55 फीसदी था। शुद्ध एनपीए भी मार्च, 2015 के 4.06 फीसदी की तुलना में 8.61 फीसदी पर पहुंच गया। कुल मिलाकर बैंक का अब तक का एनपीए एक साल पहले के एनपीए के तुलना में दोगुना होकर 55,818 करोड़ पर पहुंच गया है। सुब्रमण्यन ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में पीएनबी की कुल आय 1.33 फीसदी घटकर 13276 करोड़ रुपये रही जो एक वर्ष पहले की इसी तिमाही में 13455 करोड़ रुपये थी।

इस दौरान ब्याज आय 27 फीसदी घटकर 2768 करोड़ रुपये रही है। इससे एक वर्ष पहले चौथी तिमाही में ब्याज आय 3792 करोड़ रुपये रही थी। पिछले वर्ष अंतिम तिमाही में बैंक का सकल एनपीए एक साल पहले की इसी अवधि के 8.47 फीसदी -34338 करोड़ रुपये- से बढ़कर 12.9 फीसदी -55818 करोड़  रुपये- हो गया है, जबकि शुद्घ एनपीए 5.86 फीसदी -22983 करोड़ रुपये- से बढ़कर 8.61 फीसदी -35423 करोड़ रुपये- पर पहुंच गया है। इसी वजह से अंतिम तिमाही में इसे 10485 करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग करनी पड़ी। पीएनबी के कार्यकारी निदेशक आर एस संगापुरा का कहना है कि एनपीए अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं और बैलेंसशीट का क्लीनअप अभी पूरा नहीं हुआ है। यह कब तक हो पाएगा, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि यह तो अर्थव्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगा। 2015-16 के दौरान पीएनबी को 3974 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ जबकि बैंक को एक वर्ष पहले 3061 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था।
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क्या होता है एनपीए 

बैंक
गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए - नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) बैंकों की ऐसी परिसंपत्तियों को कहते हैं जिस पर कोई रिटर्न (लाभ) नहीं मिल रहा है। चूंकि बैंकों की संपत्तियां कर्ज और अग्रिम (एडवांस) होती हैं, इसलिए इनके परफॉर्म न करने (लाभ न कमाने को) को नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स कहते हैं। कहने का मतलब यह है बैंकों के कर्जे फंस चुके होते हैं। कर्जदार इस पर न तो बैंक को कोई ब्याज दे रहा होता है और न ही मूलधन लौटा रहा होता है। 

क्यों बढ़ता है एनपीए 
बैंकों की ओर से लापरवाही से कर्ज देने से 
कॉरपोरेट-राजनीतिक नेताओं के नापाक गठजोड़ से
अर्थव्यवस्था के खराब प्रदर्शन और सुधार न होने से 

एनपीए घटाने का क्या है उपाय ?
अमूमन फंसे कर्ज की री-स्ट्रक्चरिंग यानी पुनर्गठन के जरिये उगाही का रास्ता तलाशा जाता है। पुनर्गठन का मतलब ब्याज दरें कम करना या अदायगी अवधि
बढ़ाना होता है। आसान शर्तों की वजह से कर्जदार कंपनियों का बोझ कम हो जाता है। 

 हमारे लिए चिंता का विषय क्यों?
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर, 2015 तक 26 सार्वजनिक बैंकों का एनपीए बढ़ कर 4,04,667 करोड़ रुपये हो चुका था। अगर हालात नहीं
सुधरे तो यह जल्द ही बढ़कर 8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जो बैंकों की ओर से दिए गए कुल कर्ज का 11.25 प्रतिशत है।   बैंकों में आम आदमी
का पैसा जमा होता है और उस पर उसे काफी कम ब्याज (चार से छह फीसदी तक) मिलता है। लिहाजा कर्ज की उगाही न होने पर कम ब्याज देकर इकट्ठा
किया हुआ जनता का पैसा ही डूबता है और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है। 

क्या है प्रोविजनिंग
बैंक अपने फंसे कर्ज की उगाही न होते देख अपने मुनाफे का एक हिस्सा इसकी भरपाई के लिए अलग कर देते हैं। यह राशि बैंक के ब्याज पूर्व आय से घटा
कर अलग खाते में रखी जाती है ताकि कर्ज पूरी तरह डूब जाने पर बैंक न डूब जाए। सामान्य अर्थ में बैंकों के लिए यह घाटा ही है। 
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