आम बजट में सरकारी बैंकों में 70,000 करोड़ रुपये डालने की बात कही गई है। इस पर ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (ओबीसी) का कहना है कि उसके पास पर्याप्त पूंजी है, इसलिए सरकार से पूंजी डालने का निवेदन नहीं किया गया है। बैंक के कार्यकलाप और भविष्य की रणनीतियों पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने बैंक के एमडी एवं सीईओ मुकेश कुमार जैन से बातचीत की। पेश है संपादित अंश :
केंद्र ने सरकारी बैंकों के विलय की बात कही है। ओबीसी के विलय की भी बात चल रही है। इसके लिए क्या तैयारी है?
इसमें हमें कोई खास तैयारी नहीं करनी है। सरकार जो आदेश देगी, उस पर अमल करेंगे। हालांकि, ओबीसी के विलय को लेकर सरकार से अभी तक संकेत नहीं मिला है। मुझे उम्मीद है कि ओबीसी का किसी बैंक में विलय नहीं होगा बल्कि इसमें किसी बैंक का विलय होगा। वर्तमान में हमारा बैलेंस शीट मजबूत है। ब्रांड वैल्यू बेहतर है तो ऐसे में ओबीसी का विलय किसी अन्य बैंक में क्यों किया जाएगा।
आम बजट में सरकारी बैंकों में पूंजी डालने के लिए 70,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। ओबीसी को इसमें से कितना मिलेगा?
हमें इसमें से एक पैसा भी नहीं मिलेगा क्योंकि हमने इस तरह का कोई निवेदन ही नहीं किया है। ओबीसी के पास इस समय पर्याप्त मात्रा में पूंजी है। हमारा कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो 14 फीसदी है, जो काफी बेहतर माना जाता है। हमारा नेट इंटरेस्ट मार्जिन (एनआईएम) भी इस समय 2.41 फीसदी है, जो साल के अंत तक बढ़कर 2.75 फीसदी हो सकता है। ओबीसी ने हाल ही कर्मचारी स्टॉक खरीद योजना से 250 करोड़ रुपये जुटाए हैं। यही नहीं, कॉरपोरेट खातों से भी बेहतर रिकवरी की संभावना है। इसलिए 70,000 करोड़ में से बैंक को एक पैसा भी नहीं चाहिए।
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75 फीसदी से कम करेगी। आपके यहां इस समय क्या स्थिति है?
ओबीसी में भी सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75 फीसदी से कम करेगी। इस दिशा में काम चल रहा है। हमें सांस्थानिक स्रोतों से 3,000 करोड़ रुपये जुटाने की पहले ही अनुमति मिल चुकी है। हालांकि, बाजार के हालात अभी ठीक नहीं हैं, इसलिए अभी यह राशि नहीं जुटाएंगे। उम्मीद है कि अक्तूबर-नवंबर तक बाजार की स्थिति ठीक हो जाएगी, जिसके बाद इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। वैसे, इसके लिए हमने अपना मर्चेंट बैंकर नियुक्त कर रखा है और वे काम कर रहे हैं।
आरबीआई ने तीन बार में नीतिगत ब्याज दर में 75 आधार अंक की कटौती की है, लेकिन बैंकों ने ब्याज दर में इतनी कटौती नहीं की है। ओबीसी ऐसा कब कर रहा है?
फिलहाल ऐसा करना संभव नहीं है। हम जो कोष जुटाते हैं, उसमें आरबीआई से महज तीन-चार फीसदी पैसा ही उस ब्याज दर पर मिलता है, जिसकी आप चर्चा कर रहे हैं। हम 97 फीसदी राशि दीर्घावधि जमाओं से जुटा रहे हैं। उस पर ज्यादा ब्याज दे रहे हैं। यह राशि सेवानिवृत्त व्यक्ति की है, गरीबों की है, छोटे निवेशकों की है। आरबीआई का हवाला देकर हम उन्हें कम ब्याज तो नहीं दे सकते हैं। ऐसा करने पर उनकी आमदनी प्रभावित होगी। इसलिए जितना संभव था, उतना ब्याज दर घटाया गया है। देखिए... किसी नीतिगत ब्याज दर के फैसले को कवर करने में करीब साल भर लग जाता है।
2018-19 की पहली तिमाही में 393 करोड़ के घाटे में रहे बैंक को इस साल की समान तिमाही में 113 करोड़ का लाभ हुआ है। इसके पीछे क्या कारण रहे?
इसे बेहतर प्रबंधन कह सकते हैं। हम अपनी संपत्ति गुणवत्ता को बेहतर कर रहे हैं। स्लिपेज पर भी लगाम लगा रहे हैं। घाटे में चल रही शाखाओं का गहन अध्ययन कर उन्हें मुनाफे में लाने का प्रयास होगा। ऐसा संभव नहीं हुआ तो घाटे में चल रहीं शाखाओं को बंद कर दिया जाएगा। बैंक की 2,390 में से 53 शाखाएं घाटे में हैं।
आपने बैंक को तर्कसंगत बनाने की भी बात की है। घाटे में चल रही शाखाओं को लाभ में कैसे लाएंगे?
इस समय ब्रांच बैंकिंग में सबसे महंगी प्रॉपर्टी की कीमत पड़ रही है। ब्रांच में जितने ज्यादा कर्मचारी होंगे, खर्च भी उतना ही बढ़ेगा। अभी सारे काम तकनीक आधारित हैं तो एक शाखा में अधिक कर्मचारियों के फौज की जरूरत नहीं है। हम देख रहे हैं कि 5,000 वर्ग फुट जगह में चलने वाली शाखा को कैसे 4,000 या 3,000 वर्ग फुट जगह में चलाया जाए। शाखाओं में स्पेस की ऑडिट चल रही है। इस मद में कम-से-कम 50 करोड़ रुपये बचाने का लक्ष्य है।
इसका मतलब है कि नई शाखाएं नहीं खुलेंगी?
ऐसा नहीं है। हमने यह नहीं कहा है कि शाखाएं बंद ही करेंगे। पहले देखा जाएगा कि घाटे वाली शाखाएं मुनाफे में आ पाती हैं या नहीं। यदि मुनाफे में आ जाती हैं तो उन्हें क्यों बंद करेंगे। रही बात नई शाखाओं की तो हमने चालू वित्त वर्ष के दौरान 25 नई शाखाएं खोलने का लक्ष्य रखा है।