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धरती की वो खौफनाक जगह, जहां से साढ़े छह करोड़ साल पहले दुनिया में आई थी कयामत

Fri, 27 Dec 2019 02:58 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
एक दौर था, जब धरती पर डायनासोर का राज था। मोटे-लंबे, हट्टे-कट्टे, उड़ने वाले, दौड़ने वाले, तमाम तरह के डायनासोर धरती पर आबाद थे। पर आज से करीब साढ़े छह करोड़ साल पहले ऐसी तबाही आई कि डायनासोर ही नहीं, धरती पर रह रहे 80 फीसदी जीव तबाह हो गए। करीब 12 किलोमीटर में फैला एक उल्कापिंड धरती से आ टकराया। इस ब्रह्मांडीय बदलाव ने धरती को झकझोर डाला था। बरसों से वैज्ञानिक उस ठिकाने की तलाश में थे, जहां पर ये उल्कापिंड टकराया था। उन्हें वो जगह मिल नहीं पा रही थी। 
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चिक्सुलब क्रेटर - फोटो : Social media
1980 के दशक में अमेरिकी पुरातत्वविदों का एक समूह, अंतरिक्ष से ली गई कुछ तस्वीरों की बारीकी से पड़ताल कर रहा था। इनमें मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप की भी तस्वीरें थीं। युकाटन के करीब ही समुद्र के भीतर एक गोलाकार जगह थी। यूं तो सेनोट्स, यानी गोलाकार सिंक होल जैसी चीजें युकाटन की पहचान हैं। यहां सैलानियों को लुभाने के लिए बनने वाले ब्रोशर्स में भी सेनोट्स का जिक्र खूब किया जाता है। सेनोट्स, युकाटान के समतल मैदानी इलाकों में दूर-दूर तक फैले हुए हैं। लेकिन, जब आप इन्हें अंतरिक्ष से देखें, तो ये गुच्छे आधे गोले के तौर पर नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि कोई गोला परकार से गोला बना रहा था, और जमीन पर आधी लकीर खींचने के बाद जमीन ही खत्म हो गई। 
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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
अमेरिकी पुरातत्वविदों ने अंतरिक्ष से ली गई इन तस्वीरों को जोड़कर देखा तो युकाटन सूबे की राजधानी मेरिडा, समुद्री बंदरगाह सिसाल और प्रोग्रेसो, एक गोलाकार दायरे में बंधे से मालूम हुए। कभी ये इलाका माया सभ्यता का केंद्र हुआ करता था। अमेरिकी मूल निवासी माया के लोग इन सेनोट्स पर पीने के पानी के लिए निर्भर थे। वैज्ञानिकों को ये बात बड़ी अजीब लगी कि ये सभी एक गोलाकार दायरे में फैले हैं।

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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
1988 में जब वैज्ञानिकों की कांफ्रेंस सेल्पर का आयोजन मेक्सिको के अकापल्को में हुआ, तो वहां इन अमेरिकी पुरातत्व वैज्ञानिकों ने इस बात को सबके सामने रखा। इस कांफ्रेंस में एड्रियाना ओकैम्पो भी मौजूद थीं। एड्रियाना ने उस वक्त नासा में नौकरी शुरू की थी। वो एक भूवैज्ञानिक हैं। अब 63 बरस की हो चुकीं एड्रियाना बताती हैं कि उन्हें वो अर्धगोलाकार दायरे में फैले सिंक होल देखकर लगा कि उन्हें अपनी मंजिल मिल गई है। अब एड्रियाना नासा के लूसी मिशन से जुड़ी हैं जिसके तहत बृहस्पति ग्रह पर 2021 तक यान भेजा जाना है। उन्हें तस्वीरें देखते ही लग गया था कि ये वो जगह हो सकती है जहां पर कभी उल्कापिंड टकराया था। मगर बिना सबूत ये बात वो पक्के तौर पर नहीं कह सकती थीं। सो, उन्होंने बाकी वैज्ञानिकों से पूछा कि क्या उन्हें ये ख्याल आया है?
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युकाटन प्रायद्वीप में बना सिंकहोल - फोटो : Social media
एड्रियाना हैरानी से कहती हैं कि 'वैज्ञानिकों को ये समझ ही नहीं आया कि मैं उनसे क्या बात पूछ रही हूं।' लेकिन उन तस्वीरों से एड्रियाना ओकैम्पो का सामना होना, एक विशाल मिशन की शुरुआत थी, जिसमें ये पता लगाया गया कि युकाटन प्रायद्वीप के किनारे-किनारे स्थित वो सिंक होल या सेन्टोस असल में वो ठिकाने हैं, जहां पर साढ़े छह करोड़ साल पहले धरती से उल्कापिंड टकराया था। इस महाविस्फोट से ऐसी कयामत आई थी कि पूछिए मत! चट्टानें पिघल गई थीं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
1990 के दशक से ही अमेरिका, यूरोप और एशिया के वैज्ञानिक, इस पहेली की कड़ियां जोड़ रहे थे। अब वो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि 6.5 करोड़ साल पहले जो 12 किलोमीटर चौड़ा उल्कापिंड धरती से टकराया था, उससे 30 किलोमीटर गहरा गड्ढा धरती पर बन गया था। इस टक्कर से पिघली चट्टानों से माउंट एवरेस्ट से भी ऊंचा पर्वत बन गया था, जो बाद में ढह गया। प्रलंयकारी इस घटना से दुनिया पूरी तरह से बदल गई थी। करीब साल भर तक धुएं का गुबार धरती पर मंडराता रहा था। सूरज की किरणें धरती पर आनी बंद हो गई थीं। पूरे साल भर तक धरती पर रात रही थी। इससे धरती का तापमान जीरो से भी कई डिग्री सेल्सियस नीचे चला गया था। नतीजा ये हुआ था कि धरती के 80 फीसदी जीव-जंतु नष्ट हो गए। कमोबेश सारे डायनासोर उसी वजह से खत्म हो गए थे।
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चिक्सुलब पुएर्तो में बना डायनासोर मेमोरियल - फोटो : Social media
उल्कापिंड जहां पर धरती से टकराया था, उसका केंद्र आज मेक्सिको के चिक्सुलब पुएर्तो नाम के कस्बे के नीचे दबा हुआ है। बहुत ही कम आबादी वाले चिक्सुलब कस्बे में गिने-चुने कच्चे-पक्के मकान हैं। यहां की आबादी कुछ हजार होगी। इस कस्बे की शोहरत दुनिया में ज्यादा नहीं है। जिन लोगों को पता है, वो यहां आकर डायनासोर को श्रद्धांजलि देते हैं। चिक्सुलब कस्बे पहुंचने के लिए आप को टेढी-मेढ़ी सड़कों से गुजरना होगा। लोगों को इस जगह की अहमियत नहीं पता। नतीजा ये होता है कि लोग पास ही इसी नाम के एक और कस्बे चिक्सुलब पुएब्लो पहुंच जाते हैं। 

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चिक्सुलब क्रेटर साइंस म्यूजियम - फोटो : Social media
ये कस्बा प्रोग्रेसो नाम के बंदरगाह से करीब सात किलोमीटर पूरब में स्थित है। यहां आने पर आप को कतई अहसास नहीं होगा कि कभी यहां धरती को पूरी तरह बदल डालने वाली घटना हुई थी। कस्बे के मुख्य चौराहे के पास आपको बच्चों की बनाई हुई डायनासोर्स की पेंटिंग मिलेगी। एक डायनासोर का बुत भी यहां पर दिखता है। 1991 में एड्रियाना ओकैम्पो ने अपनी तफ्तीश को प्रकाशित कराया। उससे पहले तक युकाटन प्रायद्वीप के इस हिस्से में किसी की भी दिलचस्पी नहीं थी। सितंबर 2018 में यहां एक म्यूजियम खोला गया है। इसका नाम म्यूजियम ऑफ साइंस ऑफ द चिक्सुलब क्रेटर है। इस म्यूजियम का मकसद लोगों को 6.6 करोड़ साल पहले आई कयामत से रूबरू कराना है। इस म्यूजियम की मदद से यहां टूरिज्म को बढ़ावा देने की तैयारी है।

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डायनासोर - फोटो : Social media
ये इलाका माया सभ्यता का भी गढ़ रहा है। सो, यहां के मूल निवासियों की सभ्यता की पहचान को भी जुटाकर प्रदर्शनी लगाने का काम किया जा रहा है। एड्रियाना ओकैम्पो मानती हैं कि चिक्सुलब पुएर्तो और आस-पास के इलाकों को दुनिया में और शोहरत मिलनी चाहिए। इस तबाही का नतीजा था कि आज इंसान का दुनिया पर राज है। वरना अगर डायनासोर जिंदा होते, तो हम नहीं होते। एड्रियाना कहती हैं कि उस प्रलय से ही इंसानी सभ्यता को पनपने का मौका मिला।  

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : BBC
एड्रियाना को उस उल्कापिंड के टकराने की सही जगह का पता लगाने में मशहूर अंतरिक्ष वैज्ञानिक यूजीन शूमेकर से मदद मिली थी। शूमेकर इकलौते वैज्ञानिक हैं, जिनकी अस्थियों की राख चांद पर दफ्न है। शूमेकर ने एड्रियाना को कहा था कि उस घटना के सिवा किसी और खगोलीय घटना से बने बिल्कुल गोलाकार सबूत मिलने नामुमकिन हैं। इसलिए अगर एड्रियाना की तलाश पूरी हो गई, तो उससे धरती के भौगोलिक विकास की एक रेखा खींचने में मदद मिलेगी। उल्कापिंड की टक्कर से डायनासोर के खात्मे की थ्योरी सबसे पहले कैलिफोर्निया के पिता-पुत्र लुई और वाल्टर अल्वारेज की जोड़ी ने 1980 के दशक में प्रस्तावित की थी। मगर तब उसका बहुत विरोध हुआ था। लेकिन, एड्रियाना की तलाश से अल्वारेज पिता-पुत्र की थ्योरी सही साबित होती है। 

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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
इस पहेली की कई कड़ियां बिखरी हुई थीं। जैसे कि 1978 में भूवैज्ञानिक ग्लेन पेनफील्ड ने मेक्सिको की सरकारी तेल कंपनी पेमेक्स के लिए कैरेबियाई समुद्र के ऊपर के चक्कर लगाकर इसका सर्वे किया था। तेल की तलाश करते-करते उन्हें समुद्र के भीतर विशाल गड्ढा दिखा था। लेकिन ये सबूत तेल कंपनी पेमेक्स की मिल्कियत थी। सो, इसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। युकाटन के इस गोले को अल्वारेज की थ्योरी से जोड़ने का काम टेक्सस के पत्रकार कार्लोस बायर्स ने किया था। कार्लोस ने 1981 में ह्यूस्टन क्रॉनिकल में अपने लेख में सवाल उठाया था कि क्या दोनों में कोई रिश्ता है? 

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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
बायर्स ने अपनी ये थ्योरी एक छात्र एलन हिल्डेब्रैंड से भी साझा की। एलन ने फिर पेनफील्ड से संपर्क साधा। फिर दोनों मिलकर इस नतीजे पर पहुंचे कि जो गड्ढा समुद्र के भीतर था, वो कोई ज्वालामुखी नहीं, बल्कि उल्कापिंड के टकराने से बना गड्ढा था। एड्रियाना ओकैम्पो हैरानी जताती हैं, 'एक पत्रकार ने इतनी बड़ी खोज की!' पर ये कहानी इतिहास के बिखरे हुए पन्नों को जोड़ने भर की नहीं है। ये हमें धरती से परे की दुनिया के बारे में जानकारी बढ़ाने में भी मददगार हो सकती है। नासा ने इस जानकारी का उपयोग मंगल ग्रह पर भेजे अपने यान क्यूरियोसिटी से आंकड़े जुटाने में किया है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : nasa
मंगल की सतह और भूवैज्ञानिक गठन को जांच-परख कर ये पता लगाया जा रहा है कि उल्कापिंड टकराने का मंगल ग्रह पर क्या नतीजा हुआ होगा। संकेत ऐसे मिलते हैं कि मंगल ग्रह का वायुमंडल पहले धरती जैसा ही रहा होगा। एड्रियाना कहती हैं कि, 'अतीत की घटनाओं से हमें भविष्य के संकेत मिलते हैं। उनकी तैयारी आसान होती है। जो भी युकाटन प्रायद्वीप पर हुआ, उससे मंगल पर हुई भौगोलीय घटनाओं के संकेत मिलते हैं।' लेकिन, चिक्सुलब क्रेटर से जुड़ी ज्यादातर जानकारी चट्टानों की मोटी परतों के भीतर दबी हुई है। स्थानीय लोगों को अभी भी इसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। 
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युकाटन प्रायद्वीप - फोटो : Social media
मेक्सिको की सरकार ने इस क्रेटर को विश्व धरोहर घोषित करने के लिए यूनेस्को में अर्जी दी है। यहां स्थित मीठे पानी के गड्ढों में मछलियों के साथ तैरते हुए शायद ही लोगों को अहसास होता होगा कि ये वो जगह है, जो प्रलय का गवाह रहा है। ऐसी कयामत जो धरती ने 10 करोड़ साल में सिर्फ एक बार देखी है। एड्रियाना इस बात पर अफसोस जताती हैं। वो कहती हैं कि, 'ये हमारे ग्रह की सबसे खास जगह है। ये विश्व धरोहर है।' 
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