तालिबान के काबुल पर काबिज होने के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरेश अफगानिस्तान की महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। यूरोपिय देशों के साथ-साथ करीब 20 और देशों ने एक साझा बयान जारी कर महिलाओं के अधिकारों और उनकी आजादी सुनिश्चित करने की बात कही है।
शरीया कानून के तहत हुकूमत करने की बात करने वाला तालिबान भले ही यह भरोसा दे चुका है कि वह महिलाओं को अपने कानून के तहत 'आजादी' देगा, वह महिलाओं को काम पर जाने से नहीं रोकेगा, लेकिन उसके कट्टर शासन का इतिहास देखते हुए इस बात पर यकीन करना मुश्किल है। दुनिया की आशंका सच साबित होती दिख रही है।
अफगानिस्तान की टीवी पत्रकार शबनम दावरान ने तालिबान के इरादों की कलई खोल दी है। शबना दावरान ने दुनिया को बता दिया है कि तालिबान ने उन्हें काम करने से रोक दिया है। शबनम से बताया कि तालिबान ने उनसे कहा- तुम एक महिला हो, अपने घर जाओ। तुम यहां काम नहीं कर सकती। इससे पहले अमेरिकी मीडिया हाउस सीएनएन चीफ इंटरनेशनल रिपोर्टर क्लैरिसा वार्ड हिजाब में नजर आईं थीं।
कथित तौर पर तालिबान ने 15 से 45 साल की अकेली महिलाओं और विधवाओं की सूची बनाकर देने को कहा है, ताकि तालिबानी लड़ाके उनसे शादी कर सकें। महिलाएं बुर्का पहनने के मजबूर हो रही हैं और तालिबान लड़ाकों की खौफ की वजह से कामकाजी महिलाओं ने दफ्तर जाना बंद कर दिया है।
तालिबान के कट्टर शासन के इतिहास को देखते हुए इस रिपोर्ट में हम कुछ मुस्लिम बहुल देशों जैसे मिस्र, ईरान, सऊदी अरब की महिलाओं के अधिकारों की स्थिति और उनके हालात पर एक नज़र डालने की कोशिश करते हैं। साथ ही यह समझते हैं कि कानून की नजर में उन्हें समानता का क्या अधिकार हासिल हुआ है? लेकिन पहले यह जान लीजिए कि 2001 से पहले जब तालिबान का अफगानिस्तान पर शासन था तो महिलाओं की जिंदगी कैसी थी?
- महिलाओं पर खूब जुल्म ढाए जाते थे।
- उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता था।
- उन्हें पढ़ने की इजाजत नहीं थी।
- दफ्तरों में काम करने पर पाबंदी थी।
- हील्स पहनकर बाहर निकलने की मनाही थी।
- घर की बालकानी या छत पर जाना मना था।
- घर के किसी मर्द के बिना बाहर जाना मना था।
- अकेले घर से निकलने पर उन्हें पीटा जाता था।