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प्यास से बेहाल, फर्श चाटती वो बाघिन

Sun, 08 May 2016 11:19 AM IST
संजय तिवारी नागपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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जंगल में भी नहीं मिल रहा पानी - फोटो : bbc
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बढ़ते पारे और झुलसा देने वाली गर्मी के बीच खबरे हैं कि महाराष्ट्र और दूसरे सूबों में पानी की किल्लत से जंगली जानवरों के हालात खराब हो रहे हैं। लेकिन, सवाल यह है कि क्या वन विभाग पर्याप्त कदम उठा रहा है? क्या यह भी देखा जा रहा है कि जमीनी हकीकत क्या है? इसे समझने के लिए ये दिलचस्प मिसाल हो सकती है।
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नागपुर में एक शाम का नजारा है, एक बाघिन परेशान और बेहद थकान से जूझ रही है। वो पौधों के बीच एक हैंडपंप वाले बोरवेल के करीब घूमती दिखाई देती है, फिर बैठ जाती है।

इसके बाद वह बोरवेल के पास बने वॉटर होल की सीमेंट कंक्रीट की बनी सूखी फर्श चाटने की कोशिश करती है लेकिन झट से हट जाती है। जाहिर है, तपती दोपहरी के बाद फर्श भी तप रहा है। अब वो बोरवेल के पास बैठ कर सड़क की ओर देखने लगती है जहां एक कार खड़ी है। 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच झुलसाते मौसम में जंगली पशुओं की दयनीय हालात को बताने वाला यह एक मोबाइल क्लिप का वीडियो है। इस वीडियो को एक वन्यजीव प्रेमी प्रज्वल जोसेफ ने फिल्माया है। मूल रूप से नागपुर के रहने वाले प्रज्वल मुंबई में गायक-संगीतकार हैं और पिंकू जोसेफ के नाम से शोज भी करते हैं।
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वे बताते हैं कि नागुपर में दो मई को शाम छह बजे नागपुर से करीब 46 किलोमीटर दूर उन्हें मोबाइल फोन से ये वीडियो रिकॉर्ड किया।

उनके शब्दों में यह घटना कुछ ऐसी थी-

“मैं दो गांवों के बीच से गुजर रहा था, जो घने जंगल का इलाका है। वन विभाग की ओर से वहां हैंडपंप वाला बोरवेल लगा है और उससे जुड़ा सीमेंट का वॉटर होल भी बना है।” “मैंने देखा कि उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं था। पानी की नमी भी नहीं थी जैसे कई दिनों से उसमें पानी नहीं रहा होगा। मैंने पौधों के पीछे एक बाघिन देखी है जो उठी और हैंडपंप के करीब आ गई।” “वह हैंडपंप के उस पार थी और मैं अपनी गाड़ी में बैठा था। बाहर निकलने का सवाल ही नहीं था। वह देखती रही मानों कह रही हो कि भैया तुम ही पानी भर दो। मैं उस सीन से बेहद डिस्टर्ब हो गया था।”



उस दिन पिंकू जैसे-तैसे अपनी कार लेकर वहां से हट गए लेकिन उन्होंने अगले दिन अपने कजिन के साथ पानी की कुछ कैन खरीदीं और उसी जगह पर जाकर उसे उड़ेल दिया। फिर भी वॉटर होल सूखा ही रहा लेकिन हैंडपंप चलाने से पानी आने लगा। जोसेफ आगे बताते हैं, “मैं एक घंटे बाद दोबारा उस स्थान पर लौटा तो देखा कि वहां बंदर, नीलगाय, बुलबुल, गिलहरियां, मोर और कुछ पक्षी भी थे। कुछ पानी पी रहे थे। पूरा माहौल एकदम जीवंत लग रहा था।”
लेकिन जोसेफ सवाल भी पूछते हैं, “वन विभाग से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है, मेरा सवाल बस इतना है कि जब वॉटर होल बनाया है तो वहां पानी क्यों नहीं भरा जाता?” बहरहाल, पिंकू एक घंटा कार चलाकर उसी स्थान पर जाते हैं और हैंडपंप से चलाकर वॉटर होल भरने के लिए।



टाइगर लैंड मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन के सचिव संदीप सुरेका बताते हैं, “चार मई की शाम घने और सुनसान जंगल में हैंडपंप से पानी निकालते पिंकू से हुई मुलाकात को वो भूल नहीं पाएंगे। हमने गांव वालों से अनुरोध किया है कि वे आते जाते हैं दो-चार बार हैंडपंप पर पानी चला दिया करें।” करीब के गांव कातलाबोडी के निवासी ज्ञानेश्वर कोवे साफ कहते हैं कि इस जंगल में कई बाघ, जंगली सुअर, नील गाय, बंदर और कई तरह के पक्षी हैं।

उन्होंने बताया, “ये वॉटर होल करीब एक साल पहले बनाया गया। जब कोई बड़े साहब का दौरा हो तो फॉरेस्ट गार्ड हैंडपंप चलाकर वाटर होल भर जाते हैं। नहीं तो यह सूखा ही रहता है। जब तापमान 44-45 डिग्री हो तो पानी झट से सूख जाता है।”



हालांकि वन विभाग के अधिकारी कुछ कहने से कतराते हैं, लेकिन उनका सीधा जवाब भी होता है कि जंगलों में पशुओं को पानी मुहैया कराने के हर संभव प्रयास किए गए हैं।
महाराष्ट्र सरकार के वन्य जीव विभाग के प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (पीसीसीएफ) श्री भगवान का कहना है कि वन विभाग के फॉरेस्ट गॉर्ड्स वॉटर होल्स पर नजर रख रहे हैं।

उन्होंने कहा, “विभाग के पास अपने ट्रैक्टर्स भी है, जो वॉटर होल्स में पानी भरने के लिए इस्तेमाल हो रहे है। जिला वन अधिकारी और अन्य अधिकारी उनके कामों की समीक्षा करते रहते हैं।”
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श्री भगवान ने ये भी वादा किया है कि वे अगले सोमवार को अपनी साप्ताहिक समीक्षा में वे इस मुद्दे को देखेंगे और कोई कमी हुई तो उसे दूर करेंगे।
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