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आखिर दिल्ली-एनसीआर में ही क्यों आ रहे हैं भूकंप के इतने झटके? हैरान हो जाएंगे जानकर

Sat, 06 Jun 2020 01:32 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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इंडिया गेट (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भारत के दिल्ली-एनसीआर इलाके में इस साल की 12 अप्रैल और तीन मई के बीच में नेशनल सेंटर ऑफ सीसमोलोजी ने भूकंप के सात झटके रिकॉर्ड किए। इनमें से किसी भी झटके की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर चार से ज्यादा की नहीं थी और जानकरों को लगता है कि पांच से कम तीव्रता वाले भूकंप के झटकों से बड़ा नुकसान नहीं होने की संभावना प्रबल रहती है। 

इस बीच दो सवाल जरूर उठ रहे हैं। पहला ये कि आखिर दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के झटकों के वाकये बढ़ क्यों रहे हैं और क्या भविष्य के लिए ये बड़ी चिंता का विषय बन सकता है? लेकिन सबसे पहले इस बात को समझने की जरूरत है कि भारत में भूकंप की क्या आशंकाएं हैं। भूगर्भ विशेषज्ञों ने भारत के करीब 59% भू-भाग को भूकंप संभावित क्षेत्र के रूप में वर्गित किया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दुनिया के दूसरे देशों की तरह ही भारत में ऐसे जोन रेखांकित किए गए हैं जिनसे पता चलता है कि किस हिस्से में सीस्मिक गतिविधि (पृथ्वी के भीतर की परतों में होने वाली भोगौलिक हलचल) ज्यादा रहती हैं और किन हिस्सों में कम। वैज्ञानिकों ने इसका तरीका निकाला है भूकंप संभावित क्षेत्रों के चार-पांच सीस्मिक जोन बना कर उन्हें चिन्हित करना। जोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है वहीं जोन-5 में ज्यादा प्रबल रहती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दिल्ली-एनसीआर का इलाका सीस्मिक जोन-4 में आता है और यही वजह है कि उत्तर-भारत के इस क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियां तेज रहती हैं। जानकार सीस्मिक जोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज्यादा बताते हैं। गौरतलब है कि मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सिस्मिक जोन-3 की श्रेणी में आते हैं। जबकि भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। 

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दिल्ली शहर का एक नजारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
'इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स' के अध्यक्ष प्रोफेसर महेश टंडन को लगता है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमजोर इमारतों से भी खतरा है। उन्होंने कहा, 'हमारे अनुमान के मुताबिक दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज से डिजाइन ही नहीं की गई हैं। पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें खास तौर पर बहुत ज्यादा चिंता की बात है, क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जांच नहीं हुई है।' 
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निर्माणाधीन इमारत (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चंद वर्षों पहले आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप रहित होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ उल्लेख होना चाहिए। फिलहाल तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या आबादी का घनत्व भी है। डेढ़ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हो चुकी हैं और तमाम मोहल्ले एक दूसरे से सटे हुए बने हैं। 
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दिल्ली का एक नजारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार दिल्ली और उत्तर भारत में छोटे-मोटे झटके या आफ्टरशॉक्स तो आते ही रहेंगे, लेकिन जो बड़ा भूकंप होता है उसकी वापसी पांच वर्ष में जरूर होती है और इसीलिए ये चिंता का विषय है। वैसे भी दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाके के पास भूगर्भ में फॉल्ट लाइन मौजूद है, जिसके चलते भविष्य में किसी बड़ी तीव्रता वाले भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन टेक्नोलोजी के प्रमुख भूगर्भशास्त्री डॉक्टर कालचंद जैन मानते हैं कि, 'किसी बड़े भूकंप के समय, स्थान और रिक्टर पैमाने पर तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।' लेकिन उन्ही के मुताबिक, 'हम इस बात को भी कह सकते हैं कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियां सिलसिलेवार रहीं हैं और वे किसी बड़े भूकंप की भी वजह हो सकती हैं।' 
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प्राचीन दिल्ली की एक झलक (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भूकंप और सीस्मिक जोन से जुड़ी एक और अहम बात है कि किसी भी बड़े भूकंप की रेंज 250-350 किलोमीटर तक हो सकती है। मिसाल के तौर पर 2001 में गुजरात के भुज में आए भूकंप ने करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित अहमदाबाद में भी बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। अगर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पिछले 300 वर्षों के भूकंप इतिहास को टटोला जाए तो सबसे ज्यादा तबाही मचाने वाला भूकंप 15 जुलाई, 1720 का बताया जाता है। 

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व सहायक महानिदेशक डॉक्टर प्रभास पांडे ने इस मामले पर वर्षों तक रिसर्च करके अपने स्टडी में इसका जिक्र किया है। उनके अनुसार, '1720 वाले भूकंप की तीव्रता का अंदाजा 1883 में प्रकाशित हुए 'द ओल्डहैम्स कैटालॉग ऑफ इंडियन अर्थक्वेक्स' से मिलता है और रिक्टर पैमाने पर ये 6.5-7.0 के बीच का रहा था। इसने पुरानी दिल्ली और अब नई दिल्ली इलाके में भारी तबाही मचाई थी और भूकंप के पांच महीनों बाद तक हल्के झटके महसूस किए गए थे।' 

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भूकंप से प्रभावित घर (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
डॉक्टर प्रभास पांडे आगे लिखते हैं, 'अगर 20वीं सदी की बात हो तो 1905 में कांगड़ा, 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप उत्तर भारत में बड़े कहे जाएंगे और इनके कोई न कोई जुड़ाव पृथ्वी के बीचे वाली गतिविधियों से रहा है जो एक ही समय पर दिल्ली-एनसीआर में भी महसूस की गईं हैं।'

सवाल यह भी है कि दिल्ली भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है। सार्क डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर के निदेशक प्रोफेसर संतोष कुमार को लगता है कि पहले की तुलना में अब भारत ऐसी किसी आपदा से बेहतर निपट सकता है। 

उन्होंने बताया, 'देखिए आशंकाएं सिर्फ अनुमान पर आधारित होती हैं। अगर हम लातूर में आ चुके भूकंप को ध्यान में रखें तो निश्चित तौर पर दिल्ली में कई भवन असुरक्षित हैं, लेकिन बहुत सी जगह सुरक्षित भी हैं। सबसे अहम है कि हर नागरिक ऐसे खतरे को लेकर सजग रहे और सरकारें प्रयास करें कि नियमों का उल्लंघन कत्तर्ई न हो।' 
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दिल्ली की एक झलक (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जिनमें रेट्रोफिटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख्त जरूरत है। उन्होंने कहा, 'भारत के कई हिस्सों से इमारतों के जमीन में धसने की खबरें आती रहती हैं और वो भी बिना भूकंप के। अब चूंकि दिल्ली-एनसीआर का इलाका पहले से ही यमुना नदी के दोआब पर फैलता गया है तो जाहिर है बड़े भूकंप को झेल पाने की क्षमता भी कम होगी। जरूरत पुरानी इमारतों की पूरी मरम्मत करके, सभी नई इमारतों को कम से कम 7.0 रिक्टर स्केल की तीव्रता वाले भूकंप को झेलने वाला बनाने की है।'  
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