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भारत का इकलौता ऐसा जज जिसे फांसी पर लटकाया गया, वजह है बेहद खौफनाक

Fri, 10 Jan 2020 02:47 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
किसी अपराधी को जज द्वारा फांसी की सजा दिए जाने की बातें तो आपने बहुत सुनी और देखी होंगी, लेकिन क्या किसी जज को फांसी पर लटकाया गया हो, ऐसा सुना है आपने? जी हां, यह बात बहुत पुरानी है, लेकिन है हकीकत। आज से 44 साल पहले यानी साल 1976 में एक जज को फांसी पर लटकाया गया था और इसकी वजह बेहद ही खौफनाक है, जिसे जानकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
इस जज का नाम है उपेंद्र नाथ राजखोवा। वह असम के ढुबरी जिले (जिसे डुबरी या धुबरी नाम से भी जाना जाता है) में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात थे। उन्हें सरकारी आवास भी मिला हुआ था, जिसके अगल-बगल में अन्य सरकारी अधिकारियों के भी आवास थे। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
यह 1970 की बात है। तब उपेंद्र नाथ राजखोवा सेवानिवृत होने वाले थे। फरवरी 1970 में वो सेवानिवृत हो गए थे। हालांकि उन्होंने सरकारी बंगला खाली नहीं किया था। इसी बीच उनकी पत्नी और तीन बेटियां अचानक गायब हो गईं। हालांकि इसके बारे में उपेंद्र नाथ के अलावा किसी को भी कुछ पता नहीं था। जब भी उनसे कोई पूछता कि उनका परिवार कहां है, तो वह कुछ न कुछ बहाना बना देते कि यहां गए हैं, वहां गए हैं।  

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अप्रैल 1970 में उपेंद्र नाथ राजखोवा सरकारी बंगला खाली करके चले गए और उनकी जगह एक दूसरे जज आ गए। हालांकि राजखोवा कहां गए, इसके बारे में किसी को भी पता नहीं था। चूंकि राजखोवा के साले यानी उनके पत्नी के भाई पुलिस में थे, उन्हें कहीं से पता चला कि राजखोवा सिलीगुड़ी के एक होटल में कई दिनों से ठहरे हुए हैं। इसके बाद वह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ होटल में गए और उनसे मिले और अपनी बहन और भांजियों के बारे में पूछा। इसपर राजखोवा ने तरह-तरह के बहाने बनाए। इस बीच उन्होंने कमरे के अंदर ही आत्महत्या करने की भी कोशिश की, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pxhere
हालांकि बाद में राजखोवा ने पुलिस के सामने ये कबूल किया कि उन्होंने ही अपनी पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या की है और उन चारों की लाश को अपने उसी सरकारी बंगले में जमीन के अंदर गाड़ दिया है। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लगभग एक साल तक केस चला और निचली अदालत ने उपेंद्र नाथ राजखोवा को फांसी की सजा सुनाई। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media
इसके बाद उपेंद्र नाथ राजखोवा ने फांसी की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। फिर राजखोवा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कहा जाता है कि राजखोआ ने दया याचिका के लिए राष्ट्रपति से भी अपील की थी, लेकिन उन्होंने भी उसकी अपील को ठुकरा दिया था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File photo
14 फरवरी, 1976 को जोरहट जेल में पूर्व जज उपेंद्र नाथ राजखोवा को उनकी पत्नी और तीन बेटियों की हत्या के जुर्म में फांसी दे दी गई। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बात है कि राजखोवा ने अपनी ही पत्नी और बेटियों की हत्या क्यों की थी, इसके बारे में उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया। यह अभी तक एक राज ही बना हुआ है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
उपेंद्र नाथ राजखोवा भारत का इकलौते ऐसे जज हैं, जिन्हें फांसी पर लटकाया गया। कहते हैं कि दुनिया में भी ऐसा कोई जज नहीं है, जिसे हत्या के जुर्म में फांसी की सजा हुई हो। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
उपेंद्र नाथ राजखोवा ने जिस बंगले में अपनी पत्नी और बेटियों की लाश गाड़ी थी, उसे बाद में लोग भूत बंगला कहने लगे। उस समय जो जज वहां रह रहे थे, वो भी बंगला छोड़कर दूसरी जगह चले गए। इसके बाद से वह बंगला कई सालों तक खाली रहा, क्योंकि वहां जाने को कोई तैयार ही नहीं होता था। हालांकि अब बंगले को तोड़ दिया गया है और उसकी जगह नया कोर्ट भवन बनाया जा रहा है।
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